ओबामा बनाएं कठोर अफगान नीति

ओबामा कठोर अफगान नीति बना सकें तो अमेरिका के ही नहीं, विश्व के महान नेता के तौर पर मान्य हो जाएंगे।
बराक ओबामा की दूसरी पारी में उनकी सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक है। यदि अमेरिका की अर्थव्यवस्था को वे पटरी पर ला सके तो इतिहास में उनका नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज हो जाएगा, लेकिन विदेश नीति संबंधी चुनौतियां भी कम नहीं हैं।
उनकी विदेश नीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती अफगानिस्तान है। पिछले डेढ़ सौ साल का इतिहास बताता है कि अफगानिस्तान में जो भी महाशक्ति घुसी, लहूलुहान होकर ही लौटी। तीन युद्धों में ब्रिटेन ने मात खाई, सोवियत संघ लगभग उजड़ गया और अमेरिका भी पिछले 10 वर्षों से करोड़ों-अरबों डॉलर खोता जा रहा है।
ओबामा को इस बात का श्रेय है कि उन्होंने अफगानिस्तान से वापसी का दृढ़ निर्णय किया, लेकिन क्या सचमुच वे 2014 में इस निर्णय को लागू कर सकेंगे? वे चाहें तो अफगानिस्तान को अधर में लटका छोड़कर भाग सकते हैं, लेकिन उन्हें पता है कि काबुल की सत्ता तालिबान के हाथ में चली गई तो सारे इस्लामी जगत में वे अमेरिका की नींद हराम कर देंगे।
एक तो अफगानिस्तान की भू-सामरिक अवस्थिति ऐसी है कि उसे वह एशिया का हृदय बना देती है। दूसरा, अफगान लोगों का अप्रतिम साहस उन्हें महान योद्धा बनने की क्षमता प्रदान करता है। तीसरा, अफगानिस्तान की खनिज संपदा उसकी असीम शक्ति का अजस्र स्रोत है। और चौथा तल यह है कि अफगानितान को अपना चौथा प्रांत बनाने के लिए पाकिस्तान बेताब है।
ऐसी स्थिति में ओबामा अब अगले दो साल में अपनी अफगान नीति में आमूलचूल परिवर्तन नहीं करते तो अपनी दूसरी पारी में बहुत बदनाम होकर विदा होंगे। अब ओबामा को लाग-लपेट की नीति छोडऩी होगी। पाकिस्तान को साफ-साफ बताना होगा कि अगर वह तालिबान को जरा भी शह देगा तो उसका हुक्का-पानी बंद कर दिया जाएगा।
पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति इतनी खराब है कि यदि अमेरिकी सहायता बंद हो जाए तो वह अपने अफसरों का वेतन भी नहीं चुका सकता। ओबामा ने जो अप्रतिम साहस ओसामा बिन लादेन को मार गिराने में दिखाया, वही उन्हें मुल्ला उमर तथा हक्कानी गुट के सरगनाओं को मार गिराने में दिखाना चाहिए।
'ड्रोन हमलों' की इतनी भरमार कर देनी चाहिए कि पाकिस्तानी तालिबान वजीरिस्तान से भाग खड़े हों। यदि इस नीति का पाकिस्तानी फौज विरोध करे तो उसके विरुद्ध समस्त दंडात्मक विकल्प ओबामा प्रशासन के पास तैयार होना चाहिए। पाकिस्तानी फौज क्या लीबिया के कर्नल मुअम्मर कद्दाफी से कहीं ज्यादा खतरनाक नहीं है?
यदि गद्दाफी को दंडित किया जा सकता है तो पाकिस्तानी फौज को सबक क्यों नहीं सिखाया जा सकता? जो अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध ईरान पर थोपे गए हैं, उससे कड़े प्रतिबंध पाकिस्तान पर थोपे जाने चाहिए, क्योंकि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का अड्डा बन गया है।
अब ओबामा को दोबारा चुनाव नहीं लडऩा है और अपना फौजी खर्च घटाना है, तो वह आतंकवाद की जड़ उखाडऩे का संकल्प क्यों नहीं करते? जहां तक फौज का प्रश्न है तो वह अमेरिका के आगे घुटने टेकने में जरा-भी देर नहीं लगाएगी। जरा याद करें, 2001 का समय। मुशर्रफ ने कितना शोर-शराबा किया था, लेकिन अमेरिकी ज्यों ही काबुल में घुसे, पाकिस्तान की फौजी सरकार ढेर हो गई।
पाकिस्तान अपने आपको नाटो सदस्य-सम कहने लगा। उसने अपने आपको अमेरिकी युद्ध का अग्रिम- राज्य घोषित कर दिया। अमेरिका ने भी पाकिस्तान को आतंकवादी युद्ध में अपना सामरिक सहयोगी मान लिया। पाकिस्तान को कश्मीर पर सहलाने के लिए उसने रिचर्ड हॉलब्रुक को विशेष दूत नियुक्त कर दिया।
भारत को किनारे करने के लिए ओबामा ने पाकिस्तान के सदाबहार दोस्त चीन की यात्रा की और उसे एशिया का चौधरी बनने के लिए प्रोत्साहित किया, लेकिन ओबामा शीघ्र ही मोहभंग को प्राप्त हुए। अपनी पहली पारी के उत्तराद्र्ध में ओबामा अधिक परिपक्व हुए और उन्होंने भारत को उचित महत्व देना शुरू किया, लेकिन पाकिस्तान के प्रति स्पष्ट और कठोर नीति नहीं अपना पाए।
कभी सख्त कार्रवाई और कभी समझाहट-बुझाहट। कभी अप्रत्याशित आर्थिक सहायता और कभी कड़ी निगरानी के प्रावधान। यह ढीली-ढाली नीति तालिबान को काफी पसंद आ रही है, क्योंकि वे जानते हैं कि अमेरिका रोते-धोते जैसे ही काबुल छोड़ेगा, उस पर उनका कब्जा हो जाएगा।
यदि अब ओबामा अपना लक्ष्य तय कर लें, जैसे कि उन्होंने ओसामा को मारने के लिए बनाया था, तो न केवल तालिबान का मूलोच्छेद कर सकते हैं, बल्कि अमेरिकी वापसी के बाद अफगानिस्तान को स्थिर और शांत राज्य बना सकते हैं। वे पाकिस्तान में लोकतंत्र को संबल प्रदान कर सकते हैं और अफगानिस्तान, पाकिस्तान व भारत के त्रिपक्षीय संबंधों में नए दौर की शुरुआत कर सकते हैं।
अपने इस साहसिक अभियान में वे रूस और चीन को भी बाधक नहीं पाएंगे। रूस तो यूं भी नाटो को परिवहन-सुविधा प्रदान कर रहा है। वह अपने पूर्व मुस्लिम राज्यों में तालिबानी प्रभाव को नि:शेष करना चाहता है और अफगान जनता में दोबारा लोकप्रिय होना चाहता है।
जहां तक चीन का प्रश्न है, वह पाकिस्तान का मित्र जरूर है, लेकिन सिक्यांग के इस्लामी आतंकवादियों ने उसके कान खड़े कर दिए हैं और अब भारत के प्रति भी उसका रवैया बदल रहा है। इसीलिए यह जरूरी नहीं कि हर कीमत पर वह पाकिस्तान का समर्थन करे। यदि ओबामा सही दिशा में आगे बढ़ें तो रूस और चीन भी उनका साथ देंगे।
भारत तो उनके साथ है ही। अमेरिकी वापसी के पहले अगर ओबामा चाहें तो भारत पांच लाख जवानों की ऐसी अफगान-फौज खड़ी करवा सकता है, जो उस राष्ट्र को एक अभेद्य दुर्ग में परिणत कर दे। यदि ओबामा कठोर अफगान नीति बना सकें तो अमेरिका के ही नहीं, विश्व के महान नेता के तौर पर मान्य हो जाएंगे।






