ऑफ-रिकॉर्ड से ऑन-रिकॉर्ड होने के आसार
Source: एम.जे. अकबर | Last Updated 03:48(01/01/12)
एक मजबूत और वफादार प्रधानमंत्री को हटा देना आसान नहीं होता और डॉ. मनमोहन सिंह अपने पहले कार्यकाल में ऐसे ही थे। जिस रात कांग्रेस ने लोकपाल बिल को भ्रम के कुहासे में निस्तेज हो जाने दिया, सारा देश उनकी असहायता को देख सकता था। हालांकि यह अभी भी कानाफूसी ही है, लेकिन दिल्ली में वह सवाल उठ रहा है, जो महान क्रिकेटर विजय मर्चेट की उक्ति याद दिलाता है : आपको तब रिटायर हो जाना चाहिए, जब लोग पूछ रहे हों कि क्यों, न कि कब!
किसी राजनेता के साथ ‘ऑफ द रिकॉर्ड’ और ‘ऑन द रिकॉर्ड’ बातचीत में सैद्धांतिक अंतर यह है कि पहली तरह की बातचीत के सच के करीब होने की ज्यादा संभावना होती है। ऑफ द रिकॉर्ड का मतलब बातचीत से बाहर की चीज नहीं होता, आखिरकार, कोई चीज खुद तक सीमित रखने का सबसे अच्छा रास्ता मौन होता है।
जब कोई नेता खुद को अलग करते हुए बातचीत का चुनाव करता है, तो इसका एकमात्र अर्थ होता है कि वह ऐसा संदेश दे रहा है या दे रही है, जिसमें खंडन का एक उपवाक्य पहले से ही जुड़ा है। ऑफ द रिकॉर्ड बातचीतें सार्वजनिक खेल में हताशा और गुस्से को रखने के लिए होती हैं। यह सिलसिले में संतुलन के लिए होती है और अधिकृत बक-बक में सतर्कता से चुने गए वाक्यों की तुलना में कहीं ज्यादा मजेदार होती है।
2012 के लिए एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता की एक बड़ी असाधारण तमन्ना है। वे महज एक कारण से, नए साल में विपक्षी एनडीए को सत्ता में देखना चाहते हैं : ताकि एनडीए भी ममता बनर्जी की बदमिजाजियां भुगत सके, जैसा कि वर्तमान गठबंधन ने उन्हें सहा है। उनका यह अनुमान बिल्कुल सही है कि इस संसद में बंगाल की मुख्यमंत्री के साथ गठबंधन के बगैर कोई भी सरकार संभव नहीं है। वे ममता बनर्जी के सहयोग से सरकार बचाने से ज्यादा बड़ा शाप नहीं सोच सकते।
लेकिन साहसी बनर्जी को दुस्साहस का श्रेय तो देना ही होगा। महज 19 सांसदों के साथ उन्होंने 206 सांसदों वाली मजबूत कांग्रेस को इस साल चार बार पटखनी दी है और हर बार अत्यंत अहम मामले में। उन्होंने बांग्लादेश में तीस्ता नदी जल बंटवारे पर बातचीत का हिस्सा बनने से इंकार कर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ठोकर लगाई।
उन्होंने घर पर खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मुद्दे पर उन्हें पाठ पढ़ाया। और लोकपाल बिल पर उन्होंने यूपीए को सीधे-सीधे झटक दिया। वे यह बुनियादी कायदा समझती हैं, कांग्रेस के साथ आमने-सामने की सर्वश्रेष्ठ रणनीति यह है कि कांग्रेस अपने गठबंधन सहयोगियों के साथ जिस तरह का बर्ताव करती है, उसे ही दोहराना। कांग्रेस किसी गठबंधी की सहयोगी होने के बारे में विचार नहीं करती। वह उस तरीके से खेलती है, जिसे फ्रैंक सिनात्रा पद्धति कहा जा सकता है : मेरा रास्ता, या फिर राजमार्ग।
अब ममता बनर्जी अपने वरिष्ठ साझेदार से कह रही हैं कि यदि वह सत्ता में रहना चाहता है, तो फिर यह उनकी शर्तो पर होगा। वे कांग्रेसी संस्कृति को बड़े गहरे से जानती है, आखिरकार, वे वहां रही हैं।
ममता बनर्जी कभी-कभार गलतियों के वशीभूत हो सकती हैं, लेकिन वे संयोगों में विश्वास नहीं करतीं। उनके कदम सतर्क और सुविचारित होते हैं। 2012 के लिए उनका संदेश साफ है : उनके विकल्प खुले हैं।
डीएमके की तरह दब्बू होने के उनके पास कोई कारण नहीं हैं, क्योंकि उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने के आसार नहीं के बराबर हैं। उन्हें खुल जाने का डर नहीं, क्योंकि उनके पास सीबीआई से छुपाने के लिए कोई बड़ा घोटाला ही नहीं है। इसलिए वे दिल्ली की ब्लैकमेलिंग को लेकर चिंतित नहीं हैं। वे नहीं जानतीं कि निरीह या दब्बू कैसे हुआ जाए।
ऐसे जीन उनके डीएनए से नदारद हैं। कांग्रेस मेमनों को अपने पाले में रखती रही है, यहां तक कि जब कभी उसे लगे कि भेड़ की खाल में भेड़िया छुपा है, तब भी। जब तक भेड़िया मिमियाता रहता है, सबकुछ बढ़िया रहता है। लेकिन अब उसे उर्दू शायर के लफ्जों में, ये आसार नजर आने लगे हैं कि घर को आग लगी घर के ही चिराग से। वह धीरे-धीरे, कोना-कोना करके जलेगा।
इसीलिए नए साल के पूर्वार्ध में कांग्रेस की राजनीति इस एकमात्र लक्ष्य पर केंद्रित होगी कि ममता बनर्जी के 19 सांसदों से बचाव की आड़ कैसे खोजी जाए। जरूरी नहीं कि कांग्रेस ममता की जगह किसी को लेना चाहे। वह तो बस उन्हें अप्रासंगिक बना देने की फिराक में है। वह मधुमक्खी के डंक के बगैर मधु चाहती है। यही चीज मुलायम सिंह यादव को उसकी आशाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण और निर्णायक बना देती है।
उसके आदर्श परिदृश्य में उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद मुलायम की पार्टी अकेली सबसे बड़ी पार्टी होगी, लेकिन बहुमत के लिए कांग्रेस विधायकों की मोहताज होगी। उनके सांसद दिल्ली में दो साल, 2014 के आम चुनावों तक प्रधानमंत्री राहुल गांधी को स्थिर रखने के लिए साथ-साथ चलने वाले बंधक की तरह होंगे।
लेकिन यहां पर सूक्ष्म भेद लिए हुए उप-कथानक भी है। नौटंकी के भीतर नौटंकी। प्रधानमंत्री की पहलों को ममता बनर्जी द्वारा धूल धूसरित किए जाने के दौरान श्रीमती सोनिया गांधी और राहुल गांधी चुप क्यों रहे? क्योंकि, चाहे यह अक्लमंदी हो या नहीं, उन्होंने डॉ. मनमोहन सिंह को कमजोर करके राहुल गांधी की सेवा ही की है। एक मजबूत और वफादार प्रधानमंत्री को हटा देना आसान नहीं है और डॉ. सिंह अपने पहले कार्यकाल में ऐसे ही थे।
जिस रात कांग्रेस ने लोकपाल बिल को भड़काए गए भ्रम के कुहासे में निस्तेज हो जाने दिया, सारा देश उनकी असहायता को देख सकता था। किसी विरोधी न्यूज एंकर की तुलना में टीवी पर सीधा प्रसारण सरकार के लिए कहीं ज्यादा खतरनाक होता है।
यह अभी भी कानाफूसी ही है, लेकिन दिल्ली में वह सवाल उठ रहा है, जो महान क्रिकेटर विजय मर्चेट की उक्ति की याद दिलाता है : आपको तब रिटायर हो जाना चाहिए, जब लोग पूछ रहे हों कि क्यों, न कि कब! राजनीति में कोई कानाफूसी बड़ी जल्दी शोर में बदल सकती है। बस, जरूरत होती है हालात की और पर्दे के पीछे से पुतलियों की डोर खींचने वाले की।
कांग्रेस के उस वरिष्ठ और महत्वपूर्ण शख्स के पास पहचान छुपाए रखने के लिए पर्याप्त कारण हैं। मौखिक हस्तक्षेपों में वक्त है और उन्हें क्रमबद्ध करने में भी। कांग्रेस ने अपनी बंगाल इकाई को ममता बनर्जी पर तीखे शब्दों में हमले की अनुमति दे रखी है, लेकिन वह तो सिर्फ दिल्ली का ही तेजाब है, जो रिश्तों को खाक कर सकता है। संदेश दोनों दिशाओं में तैर रहे हैं, लेकिन ऑफ-रिकॉर्ड से ऑन-रिकॉर्ड होने का पल अभी तक नहीं आया है। अगले बारह या फिर सोलह हफ्तों तक इंतजार कीजिए।
लेखक द संडे गार्जियन के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं।