जानलेवा दवा परीक्षण
Bhaskar News
| Aug 23, 2012, 00:04AM IST
दरअसल, पिछले साल 483 लोगों की मौत हुई, जिन पर नई दवाओं का परीक्षण किया गया था। लेकिन कंपनियों ने सबकी मौत का कारण नई दवा को नहीं माना। कहा कि अनेक मरीजों की मृत्यु असाध्य रोगों के कारण हुई। कंपनियों की दलील है कि अनेक मरीजों ने दरअसल इसी उम्मीद में खुद पर परीक्षण के लिए सहमति दी थी कि शायद नई दवा असर कर जाए। चूंकि ऐसे दावों की स्वतंत्र जांच का कोई तंत्र अपने देश में नहीं है, इसलिए कंपनियों की बातों का तथ्यों के साथ खंडन करना कठिन है।
बहरहाल, आरटीआई से सामने आई ताजा सूचना यह तो साबित कर ही देती है कि भारत में आम लोगों पर बड़े पैमाने पर नई दवाओं के परीक्षण किए जाते हैं और उनकी वजह से लोगों की जान भी जाती है। असल में अब जनवरी 2008 से जनवरी 2012 तक के आंकड़े उपलब्ध हैं। भारत के औषधि महानियंत्रक के दफ्तर से प्राप्त जानकारी के मुताबिक इस अवधि में 2,061 लोगों की मृत्यु दवा परीक्षण के दौरान हुई। लेकिन कंपनियों ने सबकी मौत की जिम्मेदारी नहीं ली। जिनकी ली, उनका मुआवजा भी संभवत: उनकी आर्थिक हैसियत को ध्यान में रखकर तय किया। नतीजतन, मामला सस्ते में निपट गया।
क्या ऐसा किसी विकसित देश में संभव होता? कंपनियों का कहना है कि नई दवाओं के प्रभाव एवं उनके महफूज होने की जांच के लिए इंसान पर उनका परीक्षण जरूरी है। मगर क्या ये परीक्षण उन लोगों पर होने चाहिए, जो उसके निहितार्थ समझने में अक्षम हों और जो अपनी गरीबी व अज्ञानता के कारण इसकी सहमति दे देते हों? हकीकत यही है कि दवा परीक्षण का पूरा काम अपारदर्शी ढंग से होता है। इसलिए इसे विधि से नियमित करने की आवश्यकता है। इसमें अब देर नहीं की जानी चाहिए।






