जीवन दर्शन..
एक वृद्धा अकेली रहती थी और अपनी आजीविका के लिए कपड़े सिलती थी। एक दिन वह अपनी कोठरी में बैठी सिलाई कर रही थी कि अचानक उसके हाथ से सूई गिर गई। शाम होने से वृद्धा को सूई दिखाई नहीं दी। वह खोजने की कोशिश करने लगी, किंतु असफल रही। धीरे-धीरे रात हो गई। वृद्धा फिर भी खोजती रही। तभी कोई ग्राहक उसके पास अपने कपड़े लेने आया। उसने वृद्धा से पूछा - माई, अंधेरे में क्या खोज रही हो? वृद्धा बोली - भैया, मेरी सूई गुम हो गई है। उसे खोज रही हूं। ग्राहक ने कहा - माई, सूई तो उजाले में मिलेगी। यह कहकर वह अपने कपड़े लेकर चला गया। वृद्धा कोठरी के बाहर आकर उजाले में खड़ी होकर सूई खोजने लगी। उसी समय किसी राहगीर ने उससे पूछा - ओ माई, क्या खोज रही हो?
वृद्धा ने वही जवाब दोहराया। राहगीर ने प्रश्न किया - सूई कहां खोई थी? वृद्धा बोली - कोठरी के अंदर। तब राहगीर ने हंसकर कहा - अरे माई, सूई यदि कोठरी के अंदर खोई है तो यहां बाहर कैसे मिलेगी? वृद्धा आश्चर्य से बोली - मुझे किसी ने कहा था कि सूई को उजाले में खोजो। तब राहगीर ने समझाया - चीज जहां खोई है, वहीं मिलेगी। जिसने भी ऐसा कहा, उसका मतलब यह था कि सुबह जब उजाला हो जाए, तब सूई को कोठरी में खोजना। वस्तुत: कभी-कभी समझ के फर्क से बात के मूल आशय से पृथक अर्थ ग्रहण कर लिया जाता है, जो कष्ट का कारण बनता है। इसलिए किसी के द्वारा सुझाए मार्ग या दिए गए ज्ञान पर भलीभांति विचार करने के बाद ही उसे अमल में लाना चाहिए।