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लोकपाल आएगा, पर भारत कैसे बदल पाएगा?

 
Source: एम.जे. अकबर   |   Last Updated 00:49(18/12/11)
 
 
 
 
अन्ना हजारे का आंदोलन 1970 के बाद के बरसों में जयप्रकाश नारायण के भावोत्तेजक नेतृत्व के बाद की सबसे महत्वपूर्ण गतिविधियों में रहा है, जिसे देश से स्वदेश ढालने की सुदीर्घ ऐतिहासिक प्रक्रिया का नाम दिया गया। अन्ना का असाधारण योगदान यह है कि उन्होंने बलात हमें पहचान कराई कि राजनीतिक निकाय में कैंसर घर कर गया है और अब अपनी आखिरी हद में पहुंच रहा है।

वे धमकी, दबाव और प्रलोभन के सामने डटे रहे हैं- इसमें अहं और बैंक बैलेंस, दोनों की ओर लक्ष्य करने वाले फुसलाव भी शामिल हैं। उन्होंने साहस और दृढ़ता से यह जिद की है कि हम ऐसे डॉक्टर की खोज और हॉस्पिटल के लिए जुटें, जो इस राष्ट्रीय रोग से निबटने की दिशा में काम शुरू करेंगे। दोनों ही अनिवार्य हैं, क्योंकि रोगी को चंगा कर सकने वालों की पहचान और नियुक्ति किए जाने तक कोई अगला कदम नहीं हो सकता।

लेकिन रोग की पहचान भले ही जितने भी बढ़िया तरीके से हो, उपचार नहीं है। यह उस प्रक्रिया की शुरुआत भर है। अगला कदम चाहे जो भी हो, वह ज्यादा मुश्किल होता है। लीपापोती वाला बदलाव संक्रमण के लक्षणों को छिपाएगा भर, लेकिन वह संकट को जड़ से नहीं उखाड़ेगा। अब जबकि प्रस्तावित विधेयक संसद की मसौदा समिति के पास पहुंच गया है, यह संभवत: इस विचारमंथन का वक्त है कि इससे निश्चित रूप से क्या हासिल हो सकता है।

हमें लोकपाल की जरूरत है, क्योंकि फिलहाल अपराध और दंड के बीच का अंर्तसबंध पूरी तरह टूट चुका है। अपराध चिकनी ग्रीस के जरिए सजा से अलग हुआ है। चूंकि बगैर सेना के सेनानायक सिर्फ तितलियों का पीछा कर सकता है, अपराधियों का नहीं, इसलिए एक लोकपाल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन होना ही चाहिए। बात बिल्कुल साफ है। अब आता है मुश्किल हिस्सा।

यह नया पुलिस बल आखिर कहां से उभरेगा? जैसा कि वर्तमान विधान है, यह सिर्फ कानून और व्यवस्था के आज के संरक्षकों से ही गठित हो सकता है। कोई भी अन्ना हजारे से यह अपेक्षा नहीं करता कि वे भारतीयों का ऐसा दस्ता खड़ा करेंगे, जिन्हें ईमानदारी के दैवीय महाविद्यालय से स्नातक होने के बाद कांख में बालों की जगह देवदूतों के पंख प्रदान किए जाएंगे।

सवाल यह है कि जिन लोगों ने पहली स्थिति में समस्या पैदा की, उन्हें समाधान के प्रभारी की बेहतर स्थिति क्यों मिलनी चाहिए? लोकपाल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन अवधारणा की खूबी यह है कि यह रिश्वत के खिलाफ लड़ाई के लिए प्रतिबद्ध होगा। क्या हो अगर पांच बरसों में यह बस ग्रीस की कीमत बढ़ा दे और कारोबारी बैलेंस शीटों के बीजगणित में भ्रष्टाचार का खर्च एक ऊंचे अनुपात पर पहुंच जाए?

मैं शंकालु नहीं हूं। कुछ नहीं करेंगे, तो कुछ नहीं होगा, इसलिए कुछ न करना ही सुरक्षित है के नजरिए वाला निराशाजनक दर्जा भी मैं नहीं चाहता। कुछ भी हो, अन्ना हजारे ने भारत देश के सामने विकल्पों में से ‘कुछ भी नहीं’ को हटा दिया है। और इसके लिए वे हमारी सराहना व श्रद्धा के पात्र हैं। इस सरकार के बलवान टुकड़े रहे हैं और मीडिया समेत अन्य रियासतों में उनके संगी-साथी भी, जिन्होंने सोचा था कि अन्ना के जुलूस पर कुछ तेजाब टपका देंगे और वह तितर-बितर हो जाएगा। गंभीर परामर्शदाताओं की ही चली।

वर्तमान में पेशीय पार्टी से ऊंचा दर्जा रखने वाले इक्का-दुक्का ज्ञानियों ने जान लिया कि अब और तेजाब भीड़ को भड़काएगा ही तथा यह आग पूरे देश में भड़क जाएगी। पर जब हम राह बदलने का प्रयास करते हैं और समझदारी की ओर मुड़ते हैं, तो जरूरी हो जाता है कि धूसर क्षेत्रों से पर्दा उठाया जाए, संदेहों और दुविधाओं को पहचाना जाए और उन्हें स्पष्टता की ओर ले जाने की कोशिश की जाए।

ऐसी कोई भी प्रक्रिया सड़क के विरोधाभासों की अनदेखी नहीं कर सकती। अन्ना के आंदोलन का पहला गढ़ रहा शहरी इंडिया भ्रष्टाचार के बहानों की बयानबाजी में लिप्त है, जो जवाबदेही के दर्द के बगैर दोषारोपण करने की मध्यम वर्ग की बढ़ती जरूरत को शांत करता है। इस सुकून के परिदृश्य में पुलिस, राजनेता, कारोबारी, नौकरशाह जैसे शक्तिशालियों की खास जागीर है भ्रष्टाचार। बहाना काम करता है, क्योंकि यह सच का एक बड़ा हिस्सा है, लेकिन यह पूरा सच नहीं है।

सरकार में ऐसे पुरुष और स्त्रियां हैं, जो ईमानदार हैं और उनकी संख्या मामूली नहीं है। 2जी मूल्य निर्धारण को लेकर बहस, सचमुच बहस बन सकी, तो सिर्फ इसलिए क्योंकि वित्त मंत्रालय में ऐसे अधिकारी भी थे, जिन्होंने दबने से इंकार कर दिया और फाइलों पर ईमानदारी की छाप छोड़ गए। स्पेक्ट्रम के दूसरे सिरे पर एक अलग ही वास्तविकता है। शहरी राह, जो खुद को पीड़ित मानती है और किसी विरोध प्रदर्शन में हिरावल दस्ते की भूमिका पर गर्व करती है, सड़क किनारे एक निजी सौदे का मौका मिलने पर भ्रष्टाचार की संस्कृति का फायदा उठाने के लिए कूद पड़ती है। मिसाल के लिए, कानून तोड़ने पर वह आर्थिक दंड नहीं देगी। वह बच निकलने की भ्रष्टाचारी दर को लेकर कांस्टेबल से मोलतोल करेगी। दिल्ली में एक किस्सा चल रहा है, जो लतीफा न होते हुए भी मजेदार है।

यातायात के नियम तोड़े जाने पर अब ट्रैफिक पुलिस बतौर रिश्वत 50 की बजाय 200 रुपयों की मांग कर रही है और इसे कह रही है, अन्ना हजारे रेट। ऐसा निराशावाद एक दिन भी नहीं टिक पाएगा, अगर कार चालक इसकी जगह 500 रु. का फाइन देना तय कर ले। लेन-देन पूरा होने के लिए दो पक्षों की जरूरत होती है।

इसे छोटी-मोटी गलती कहकर खारिज न करें। संस्कृति हिमकणों का जमाव ही है। अलग-अलग वे नाकाफी लग सकते हैं, लेकिन जब वे साथ मिलकर बर्फबारी में बदलते हैं, तो पूरा देश उससे बाधित हो सकता है। -लेखक द संडे गार्जियन के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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