गुरु नानक देव की जयंती एक पखवाड़ा पहले ही बीती है। मुझे याद है उस दिन भी मैं भोर से पहले जाग गया था। दुनिया नींद के आगोश में थी। पूरे चांद की रात अपने आखिरी लम्हे गिन रही थी। एक समय था, जब आईपीएस कालरा की रहनुमाई में भक्तों का एक जत्था हमारे ब्लॉक में प्रभात फेरी निकाला करता था। वे पूरे ब्लॉक का चक्कर लगाते थे और ढोलक-चिमटे की लय-ताल पर गाते रहते थे। अब ऐसा नहीं होता।
गुरु नानक जयंती की अलसुबह मुझे उनकी प्रभातफेरी की याद आज भी आती है। मेरे मन में गुरु नानक देव का एक विशिष्ट स्थान है। हालांकि मुझे बहुत धमरालु किस्म का व्यक्ति नहीं कहा जा सकता, लेकिन मैंने जपजी साहिब और बारां माह का अनुवाद किया है और सिख समुदाय द्वारा भी मुझे स्वीकार किया जाता है।
सिख इतिहास पर गहन शोध करने के बावजूद मैं खुद को सिख मत का विद्वान नहीं मानता। हालांकि मैं बाइबिल जरूर नियमित रूप से पढ़ता हूं। ओल्ड और न्यू टेस्टामेंट दोनों, जबकि मुझे नहीं लगता कि अन्य सिख विद्वान बाइबिल का पाठ करते होंगे। लेकिन मेरा मानना है कि सभी धर्मो को एक-दूसरे के धमर्ग्रंथों से सीख लेने का प्रयास करना चाहिए। विभिन्न धर्मो के सदाशय अंर्तसबंध से ही एक बेहतर दुनिया का निर्माण किया जा सकता है।
....................... सरसों का साग :
वसंत का मौसम आते ही सतलुज नदी से लेकर गंगा-यमुना के दोआब तक के मैदान सुनहरे पीले फूलों से सज जाते हैं। ये सरसों के फूल होते हैं। इस इलाके में रहने वाले लोगों के लिए उनके दोपहर के भोजन के लिए सरसों के साग से बेहतर विकल्प कोई दूसरा नहीं हो सकता। चूंकि मैं भी इसी इलाके से वास्ता रखता हूं, इसलिए मैं भी कोई अपवाद नहीं हूं।
जैसे ही मुझे पता चलता है कि सरसों का मौसम आ गया, मैं अपने रसोइये चंदन से पूछता हूं : साग कब बनाओगे? वह जवाब देता है : अभी नहीं, साग में पड़ने वाले अन्य मसाले अभी नहीं मिल पाएंगे। लेकिन मैं सरसों के साग के लिए इसरार करता रहता हूं। चंदन इसलिए भी मुझे हीले-हवाले करता रहता है, क्योंकि यह साग बनाना मुश्किल और मेहनत भरा काम है।
साग की बारीक पिसाई और उसमें पड़ने वाले मसालों का सही अंदाजा बहुत जरूरी होता है। अगर कोई निष्णात व्यक्ति यह साग पकाए, तो मैं मानता हूं कि हिंदुस्तान में इससे बेहतर पौष्टिक और स्वादिष्ट आहार कोई दूसरा नहीं हो सकता। मजे की बात यह है कि एक बार बनाने के बाद सरसों का साग अगले तीन-चार दिनों तक और स्वादिष्ट होता चला जाता है।
लेकिन जब तकरीबन एक हफ्ता पहले एंबेसेडर होटल के राजिंदर कुमार ने मुझे बेमौसम सरसों का साग भिजवाया तो मैं मारे खुशी के उछल पड़ा था। अलबत्ता जब मैंने साग चखा तो मेरे अरमान ठंडे हो गए। मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि साग-सब्जियों को उनके मौसम में ही पकाकर खाना चाहिए, अन्यथा उनके जायके में वह बात नहीं रह जाती है।
.................... शायरों की सोहबत :
कुलदीप सलिल ने उर्दू शायरी के लिए महत्वपूर्ण काम किया है। उन्होंने उन उर्दू प्रेमियों की भी अमूल्य सेवा की है, जो उर्दू की लिपि तो नहीं पढ़ सकते या उसके गूढ़ शब्दों का अर्थ नहीं समझ सकते, लेकिन उर्दू अदब में गहरी दिलचस्पी रखते हैं। हाल ही में हिंद पॉकेट बुक्स से कुलदीप सलिल का नया संकलन प्रकाशित हुआ है : ‘ग्रेट उर्दू गजल्स’। इसमें इंशा (1756-1817) से लेकर फैजाबादी (१९३१-2009) तक 55 शायरों की गजलें संकलित की गई हैं।
गजलें उर्दू के साथ ही देवनागरी और रोमन लिपियों में भी प्रकाशित की गई हैं, जबकि गजलों का अंग्रेजी अनुवाद स्वयं उन्होंने किया है। उर्दू शायरी की कुछ किताबें हमेशा मेरे सिरहाने मौजूद रहती हैं। अब कुलदीप की नई किताब ने इनकी जगह ले ली है। मैं सुबह की चाय की चुस्कियों से लेकर रात की अलविदा तक का समय उर्दू के इन शायरों के साथ ही बिताना पसंद करता हूं।
..................... दो साल की गारंटी :
हाल ही मैंने सौर ऊर्जा से चलने वाली एक ऐसी कंप्यूटर घड़ी देखी, जिसे 125 वर्षो तक का समय और दिनांक बताने के लिए प्रोग्राम किया गया था, लेकिन मजे की बात यह है कि उस घड़ी की गारंटी केवल दो साल की थी!
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डियर और डिनर :
अपनी पर्सनल डायरी के पन्ने पलटाते हुए मुझे अंग्रेजी की एक मजेदार कविता नजर आई। मैं उसे (हिंदी अनुवाद) अपने पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं :
रोसबेरी ने अपनी
अर्धागिनी से कहा
मेरी प्रियतमा
और मेरी उत्तराधिकारी
डिनर परोस दोगी तो
होऊंगा मैं आभारी।
अर्धागिनी ने
विनम्रता व भद्रता से
स्वीकारा आभार
किंतु इसके बाद कहा
डियर, डिनर तो
तुम करोगे तैयार! - लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।