समय को स्वाध्याय से जोड़ा जाए
हर व्यक्ति के जीवन में परमात्मा एक बार तो कम से कम परिवर्तनकारी समय लाता ही है। इस समय को समझ लेने का अर्थ ही स्वाध्याय है। ऋषि-मुनियों ने कहा है कि जब हम समय में स्थित हैं तो वह स्वाध्याय है और हम स्वयं में स्थित हों, तब वह स्वास्थ्य होगा।
परमात्मा और प्रकृति ने मनुष्य को स्वाध्याय और स्वास्थ्य दोनों के लिए पर्याप्त अवसर दिए हैं। पहले समय की बात की जाए। ईश्वर का सबसे महत्वपूर्ण नियम है समय। हमने तो काल को ईश्वर का रूप ही माना है। समय का संबंध गुजरने से है, इसलिए उसको स्वाध्याय से जोड़ा जाए। स्वयं का अध्ययन करने वाले समय का सही उपयोग कर सकेंगे।
विज्ञान और तकनीक के समय में हमारे लिए सबकुछ संभव होगा, लेकिन बीता हुआ वक्त कोई नहीं लौटा पाएगा। इसलिए समय को बारीकी से देखें। यदि परिवर्तन हो रहा है तो लाभ उठाएं। यदि अच्छा बुरे में बदल रहा हो तो सावधान हो जाएं और बुरा अच्छे में बदल रहा हो तो चूकें नहीं।
इसी प्रकार परमात्मा हमें स्वयं में स्थित रहने का भी मौका देता है। इसका अर्थ है थोड़ा योग-ध्यान करें। स्वास्थ्य का सही अर्थ योग में समाया है। स्वास्थ्य और बीमारी में फर्क है, बीमारी बाहरी अवस्था है। स्वास्थ्य हमारा मूल स्वभाव है। स्वास्थ्य बाहर से नहीं आता है।
बीमारी बाहर से आती है, इसलिए स्वयं में स्थित रहकर स्वास्थ्य को जानें और समय में स्थित रहकर स्वाध्याय को समझें। ये दोनों कार्य परमात्मा और प्रकृति के नियमों को पालने जैसे हैं। इतना सम्मान हमें इन दोनों का करना ही चाहिए।






