जल्द ही वह समय आने वाला है, जब दुनियाभर के उत्पाद हर देश में उपलब्ध होंगे। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि दुनिया के तमाम बड़े बदलाव अपने वक्त की जरूरत के आधार पर होते हैं। और वक्त की जरूरत यही है कि सभी देशों के लोग समान रूप से दुनिया के श्रेष्ठ उत्पादों का उपभोग कर पाएं।
यदि पासपोर्ट और वीजा जैसे जरूरी दस्तावेज हासिल करने के बाद लोग देश-विदेश की यात्रा कर सकते हैं, जो कि उनका अधिकार भी है, तो यह कहना न्यायसंगत नहीं होगा कि एक देश के उत्पाद को दूसरे देश के बाजारों तक पहुंचने से रोका जाए। इसके लिए ज्यादा कुछ करने की जरूरत है भी नहीं। बस नियम-कायदों में थोड़ा-सा बदलाव लाना होगा और दुनिया एक बड़े खुले बाजार में बदलकर रह जाएगी।
वास्तव में एक सीमा तक ऐसा पहले ही हो चुका है और यही वक्त की मांग भी है। अलबत्ता मेरे इस विचार को किसी अन्य संदर्भ से जोड़कर देखना उचित न होगा। यह विचार तो मेरे मन में तब कौंधा, जब जर्मनी में निर्मित पाचक पेय पदार्थ ‘अंडरबर्ग’ का मेरा स्टॉक खत्म हो गया। मैं रोज शाम को भोजन करने के बाद इस पेय पदार्थ का सेवन करने का आदी हो चुका हूं।
आखिर भला ऐसा क्यों हो कि मैं अपने शरीर के लिए जरूरी इस पेय पदार्थ को प्राप्त करने के लिए अक्सर जर्मनी की यात्रा करने वाले अपने मित्रों की कृपा पर निर्भर रहूं? ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि मैं शाम को अपने घर से बाहर निकलूं, खान मार्केट जाऊं और किसी भी वाइन मर्चेट से कहूं कि मुझे ‘अंडरबर्ग’ के कुछ पैकेट्स की जरूरत है और वह झट से मुझे ‘अंडरबर्ग’ निकालकर दे दे? सर्वश्रेष्ठ उत्पादों का उपभोग करना दुनियाभर के उपभोक्ताओं का अधिकार है। वैश्वीकरण के इस दौर में भला इससे उन्हें वंचित क्यों किया जाना चाहिए?
..................... यादगार संवाद :वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान मैं हांगकांग में था। उस दौरान अनेक चीनी ज्वेलर्स ने अपनी दुकानों में सेवानिवृत्त सिख पुलिसकर्मियों को गार्ड के रूप में नियुक्त किया था। इन गार्डस का काम केवल यही था कि हाथ में बंदूक थामे दरवाजे पर बैठे रहें। आम चीनी इन गार्डस से भयभीत रहते थे। एक बार जब मैं ऐसी ही एक ज्वेलरी शॉप के समीप से गुजर रहा था, तो एक गार्ड ने मुझे देखकर आवाज लगाई।
वह समझ गया था कि मैं भारत से हूं और मेरे कंधे पर कैमरा देखकर वह यह भी समझ गया था कि मैं पत्रकार हूं। हमने ‘सत श्री अकाल’ कहकर एक-दूसरे का अभिवादन किया। उसने मुझसे पूछा : ‘क्या अपने देश से आए हो?’ मैंने जवाब दिया : ‘जी हां, देश से ही आया हूं।’ उसने सिर हिलाया और कहा : ‘इन कमबख्त चीनियों से हारकर तुमने अपनी नाक कटवा ली है।
जब हम पुलिस में थे, तब हम अकेले ही छह-छह चीनियों को उठाकर थाने में बंद कर देते थे और वे चूं तक न बोल पाते थे। और तो कुछ नहीं, यहां हमारी चीनी पत्नियां ही हमें ताने मारती हैं कि तुम तो बड़ी शेखी बघारते थे, अब क्या हुआ?’
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प्रधानमंत्री बनाम बैंकर :
देश के प्रधानमंत्री अपना एक चेक भुनाने बैंक में गए। कैशियर के करीब जाकर उन्होंने कहा : ‘गुड मॉर्निग मैडम, क्या आप यह चेक भुना सकती हैं?’ कैशियर ने कहा : ‘बड़ी खुशी से, सर? क्या आप मुझे अपना आईडी दिखाएंगे?’
प्रधानमंत्री हैरान रह गए। उन्होंने कहा : ‘देखिए मैडम, मैं अपने साथ अपना आईडी तो लाया नहीं हूं, क्योंकि मैंने सोचा भी न था कि मुझसे आईडी मांगा जाएगा। शायद आपने मुझे ठीक से पहचाना नहीं। मैं देश का प्रधानमंत्री हूं।’
कैशियर ने कहा : ‘जी सर, मैं आपको भलीभांति पहचानती हूं, लेकिन नियम-कायदों का तकाजा यही है कि आप मुझे अपना आईडी दिखाएं, नहीं तो मैं आपकी कोई मदद नहीं कर पाऊंगी।’
प्रधानमंत्री ने कहा : ‘मैडम, बैंक में इतने सारे लोग मौजूद हैं। सभी मुझसे पहचानते हैं। आप किसी से भी पूछ लीजिए। मेरी पहचान किसी से भी छुपी नहीं है।’
कैशियर ने कहा : ‘देखिए सर, आप मेरी बात ही समझ नहीं पा रहे हैं। सवाल पहचान का नहीं है। सवाल बैंक के नियमों का है। मैं नियमों का उल्लंघन नहीं कर सकती।’अब प्रधानमंत्री ने याचना की मुद्रा में कहा : ‘मैडम, मैं आपसे अनुरोध करता हूं। मुझे पैसों की सख्त जरूरत है।’
कैशियर ने कहा : ‘देखिए, आपको अपनी पहचान तो सिद्ध करनी ही होगी। कुछ दिन पहले एक योगगुरु आए थे। अपनी पहचान सिद्ध करने के लिए उन्हें कुछ योगासन करके दिखाने पड़े थे। फिर उसके बाद बाएं हाथ के एक धुरंधर बल्लेबाज आए थे। उन्हें अपनी पहचान सिद्ध करने के लिए छह गेंदों पर छह छक्के लगाकर दिखाने पड़े थे। यदि आप भी अपनी पहचान सिद्ध कर पाएं तो हम आईडी के बिना भी आपको फौरन भुगतान कर देंगे।’
प्रधानमंत्री सोच में पड़ गए। थोड़ी देर बाद उन्होंने कहा : ‘मैडमजी, देखिए मुझे कुछ नहीं सूझ रहा है। मुझे बिल्कुल भी अंदाजा नहीं है कि ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए।’
कैशियर ने कहा : ‘ठीक है, ठीक है। अब और कुछ कहने की जरूरत नहीं। इससे सिद्ध होता है कि आप ही देश के प्रधानमंत्री हैं। बताइए महोदय, आपको कितने पैसों की दरकार है?’ (सौजन्य : विपिन बख्शी, दिल्ली)
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साइन बोर्ड :
एक एटीएम एक कब्रस्तान के बाहर स्थित था। उस पर यह साइन बोर्ड लगा हुआ था : ‘आप धन-दौलत को अपने साथ तो लेकर नहीं जा सकते, लेकिन कम से कम उसके समीप सो तो सकते हैं।’ (सौजन्य : रीतेन गांगुली, तेजपुर) -लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।