किसके हाथ में रहे इंटरनेट?
Bhaskar News
| Jan 02, 2013, 01:45AM IST
क्या इंटरनेट के संचालन में संयुक्त राष्ट्र की कोई भूमिका हो, इस सवाल पर दुनिया में सहमति तो नहीं है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र के विज्ञान एवं तकनीक विकास आयोग ने भारत और अन्य देशों के इससे संबंधित प्रस्ताव पर एक कार्यदल बना दिया है, जिसे इस बहस में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप माना जा रहा है।
यह प्रस्ताव कुछ समय पहले संयुक्त राष्ट्र के सामने रखा गया था। कार्यदल का काम इंटरनेट के संचालन से जुड़ी एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र की समीक्षा करना होगा। अभी इंटरनेट के डोमेन नेम और इंटरनेट प्रोटोकॉल जैसे मसलों का संचालन इंटरनेट कॉपरेरेशन फॉर असाइन्ड नेम्स एंड नंबर्स (आइकैन) नाम की एजेंसी करती है, जो अमेरिका में स्थित है।
पिछले कुछ वर्षो के दौरान यह मांग तेजी से उठी है कि इंटरनेट पर किसी अमेरिकी कंपनी की बजाय संयुक्त राष्ट्र का नियंत्रण हो। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की दलील है कि उस हालत में सरकारों की इंटरनेट के संचालन में भूमिका बन जाएगी, जिससे सूचना का मुक्त प्रवाह और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। गौरतलब है कि दिसंबर में दुबई में हुए संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में इस मुद्दे पर दुनिया की राय दो हिस्सों में बंट गई।
वहां अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार यूनियन का सम्मेलन हुआ, जो संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी है। सम्मेलन में सहमति नहीं बनी, तो अंत में कई देशों ने एक नई संधि का प्रस्ताव रख दिया। 89 देशों ने इंटरनेट युग की पहली संयुक्त राष्ट्र दूरसंचार संधि पर दस्तखत कर दिए, जबकि अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों समेत 50 देशों ने इससे इनकार कर दिया। 193 देशों के इस सम्मेलन में शामिल हुए बाकी देशों ने भारत की तरह ही यह कहा कि वे अपने देशों में विचार-विमर्श के बाद इस बारे में फैसला करेंगे।
संधि के समर्थक देशों की दलील है कि इंटरनेट के आईपी ऐड्रेस प्राकृतिक संसाधनों की तरह हैं और उन पर किसी देश के एकाधिकार को स्वीकार नहीं किया जा सकता। दुबई में हुई संधि या हाल में बने कार्यदल से तुरंत कोई फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन जानकार मानते हैं कि इससे इंटरनेट के संचालन में सरकारों की भूमिका को मान्यता एवं वैधता देने के पक्ष में एक शुरुआत हो गई है।






