सब्सिडी का नया आधार
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यह राय सही है कि 'आधार' योजना के तहत सब्सिडी सीधे उसके वाजिब हकदार के बैंक खाते में डाल देने से धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा।
उनकी यह राय भी अपनी जगह ठीक है कि आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से पारदर्शिता आएगी। वित्तमंत्री पी. चिदंबरम की इस आशा को भी निराधार नहीं कहा जा सकता कि 'आधार' नंबर से सबसे ज्यादा लाभ गरीबों को होगा, क्योंकि इसके जरिए सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों की अधिक सही ढंग से पहचान हो सकेगी।
दरअसल राजस्थान के दूदू कस्बे में यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा एक ग्रामीण को 'आधार' की 21 करोड़वीं संख्या सौंपने के साथ ही सब्सिडी के नकद हस्तांतरण योजना की शुरुआत हो गई है। इसके तहत फिलहाल देश के 51 जिलों में मनरेगा की मजदूरी के भुगतान, खाद्य एवं रसोई गैस पर मिलने वाली सब्सिडी तथा ग्रामीण आवासीय योजना, शैक्षिक वजीफा, वृद्धावस्था पेंशन जैसी योजनाओं में दिए जाने वाले धन को सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में जमा करा दिया जाएगा।
इस तरह दो दशक से चर्चा में रहे सीधे नकद सब्सिडी देने के इरादे पर अब अमल शुरू हो गया है। मगर इसके लिए सचमुच पूरी तैयारी हो गई है, इस बारे में कुछ प्रश्न अभी बाकी हैं। एक समस्या खुद 'आधार' कार्ड योजना है। कई जगहों से इस कार्ड पर गलत ब्योरे दर्ज होने की शिकायतें आई हैं। कुछ हलकों से ध्यान दिलाया गया है कि अनेक गरीबों के कार्ड इसलिए नहीं बन सके, क्योंकि वे कार्ड बनने के समय काम के लिए दूसरी जगह चले गए या उनके पास उचित दस्तावेज का अभाव था।
सब्सिडी नकद हस्तांतरित करने की योजना में एक मुश्किल यह भी है कि हजारों गरीब परिवारों के पास बैंक खाते नहीं हैं। ऐसे में यह आशंका बेबुनियाद नहीं है कि अगर ऐसी तमाम शिकायतों को दूर किए बिना यह योजना लागू कर दी गई, तो इसका विरोध गहरा सकता है, जिसके परिणामस्वरूप सब्सिडी सीधे लाभार्थी को पहुंचाने के सदाशयी उद्देश्य को दूरगामी हानि पहुंच सकती है। आशा की जानी चाहिए कि सरकार इन आशंकाओं को दूर करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री की आशाएं साकार हो सकें, इसके लिए यह सतर्कता आवश्यक है।






