संपादकीय.. हम भारत के लोगों ने जिस दिन अपने संविधान को आत्मार्पित किया, उसी दिन बाबा साहेब आंबेडकर ने उस अंतर्विरोध से आगाह किया था, जिसमें नव स्वतंत्र राष्ट्र ने प्रवेश किया था। मूल रूप से सामंती एवं विषम अर्थव्यवस्था वाले समाज के साथ एक व्यक्ति-एक वोट-एक मूल्य के सिद्धांत पर आधारित आधुनिक लोकतंत्र का प्रयोग करते हुए नए भारत ने अपनी यात्रा शुरू की। यह नहीं कहा जा सकता कि डॉ. आंबेडकर की आशंकाएं निराधार थीं, लेकिन यह सेहरा इस राष्ट्र के सिर पर है कि उसने उस बुनियादी अंतर्विरोध के बीच प्रगति की राह पकड़ी।
यह यात्रा सुगम नहीं रही है। लेकिन समय-समय पर नई चुनौतियां आने और कई बार झटके खाने के बावजूद हम आगे बढ़ते गए हैं। इस पर हम आज अवश्य संतोष कर सकते हैं। लोकतांत्रिक राजनीति समाज के भी लोकतंत्रीकरण का माध्यम बनी है। उससे हमारा गणतंत्र गुजरते समय के साथ ज्यादा समावेशी बना है।
आज आमजन अपने देश और अपनी व्यवस्था के संचालन में अधिक सहभागी भूमिका निभा रहे हैं। लोकतंत्र और किसी समाज का बेहतर भविष्य लोगों की जागरूकता और सक्रिय हिस्सेदारी पर निर्भर करता है। हमारा प्रातिनिधिक जनतंत्र ऐसी जनजागरूकता के प्रसार का स्रोत बना है, जिससे भारतीय नागरिक देश की आजादी को अपने लिए ज्यादा सार्थक बनाने के लिए सक्रिय हो सके हैं। प्राकृतिक संसाधनों पर अपने अधिकार जताने के स्थानीय समुदायों के संघर्षो से लेकर पारदर्शिता एवं कुशल प्रशासन के लिए सिविल सोसायटी के आंदोलन में हम इस नई जनचेतना की झलक देख सकते हैं।
हमारी व्यवस्था ने ऐसी मांगों, विभिन्न हितों के टकराव और विभिन्न राजनीतिक समूहों की महत्वाकांक्षाओं का समावेश करने में गजब का लचीलापन दिखाया है। उससे जनसमुदायों एवं राज्य-व्यवस्था के बीच पारस्परिक समन्वय की ऐसी परंपरा बनी है, जिससे हमारा गणतंत्र जन आकांक्षाओं का प्रतिबिंब बना है। इस रूप में स्वतंत्रता सेनानियों का सपना काफी हद तक साकार हुआ है। आज हम उसी गणतंत्र का उत्सव मना रहे हैं।