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रिश्तों में लगाएं ‘दोस्ती’ का तड़का

पं. विजयशंकर मेहता | Jan 02, 2013, 01:40AM IST
 
 

संसार में बाहर से पकड़ने की समझ आ जाए तो भी काम चल जाता है। यहां के रिश्ते भी ऊपरी होते हैं और वैसे ही निभाए जाते हैं। संसार में रहकर हम पूरी उम्र सतह पर गुजार सकते हैं। लेकिन यह तरीका परिवार में नहीं चलता।
 
गृहस्थी में तो गहराई ही उसकी सतह है। यहां जीवन अलग-अलग मिजाज के लोगों के साथ बिताना है। यहां आप बड़े हैं तो हर बार हुक्म नहीं चला सकते। छोटे हैं तो बार-बार कहना भी नहीं मान पाएंगे। रिश्तों की, पद की अदला-बदली परिवार में चलती ही रहती है।
 
परिवार के सदस्यों से जो भी आपके रिश्ते हों, उसमें दोस्ती का तड़का जरूर लगाएं। बाप-बेटे हों, पति-पत्नी हों, भाई-भाई या भाई-बहन हों, यारी का मिजाज फायदा ही पहुंचाएगा। मित्रता वह तीर है, जो बिना चुभे आपको अपने ऊपर बैठाकर दूसरे के भीतर उतार देता है। घर-परिवार में इससे खुलेपन का माहौल बनेगा। भीतर भेद रखकर घर में जीना पाप ही है।
 
पारदर्शिता परिवार में प्रेम के लिए खाद-बीज की तरह है। रिश्तों का सौंदर्य ऊपर कम नजर आता है। परत हटाकर भीतर झांकना पड़ेगा। जैसे मनुष्य के शरीर को लेकर सामान्यत: यह माना जाता है कि कुरूप देह वाले भीतर से सुंदर होते हैं और सुंदर शरीर वाले भीतर से कर्कश हो सकते हैं। कुरूपता सद्व्यवहार से भरपाई कर देती है। सौंदर्य गुमान के कारण सरलता खो देता है। इसलिए रिश्तों में झांकना उसे मजबूत करने की पायदान है। हर धर्म में पूजा की एक पद्धति है।
 
उसमें परत-दर-परत क्रिया की जाती है। जब परिवारों में धार्मिक माहौल होता है, तो सदस्य उसी शैली में अन्य सदस्यों से व्यवहार करते हैं। परत-दर-परत खोलने पर रिश्तेदारी मजबूत होती जाती है।           
 
 

 

 

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