पं. नेहरू ने महात्मा गांधी से सीखा मितव्ययिता का पाठ
Source: bhaskar news | Last Updated 01:04(01/02/12)
जीवन दर्शन.. महात्मा गांधी पार्टी के कार्यो के सिलसिले में प्राय: यात्राएं किया करते थे, जो देश की स्वतंत्रता के उद्देश्य को लेकर होती थीं। एक बार गांधीजी ऐसे ही किसी कार्य से इलाहाबाद आए और पंडित मोतीलाल नेहरू के निवास स्थान ‘आनंद भवन’ में ठहरे। नेहरू परिवार ने इसे अत्यंत सौभाग्य का विषय माना और गांधीजी का आत्मीयता से परिपूर्ण सत्कार किया।
गांधीजी रात्रि विश्राम के बाद जब सुबह उठे तो नित्य कर्म से निवृत्त होकर हाथ-मुंह धोने लगे। इसी दौरान पं. जवाहरलाल नेहरू गांधीजी से बात भी कर रहे थे। कुल्ला करते-करते गांधीजी का पानी खत्म हो गया। इससे उनका मन कुछ उखड़ गया और बातचीत बीच में ही रुक गई।
नेहरूजी ने उनसे पूछा तो वे बोले - देखो न, मैं बातचीत में इतना खो गया कि सारा पानी खर्च हो गया और अब मुझे दोबारा पानी लेना पड़ेगा। नेहरूजी उनकी बात सुनकर हंसते हुए बोले - बस, इतनी-सी बात है। यहां तो गंगा और यमुना दोनों बहती हैं।
जितना चाहे, उतना पानी इस्तेमाल कीजिए। गांधीजी ने कहा - गंगा और यमुना अकेले मेरे लिए ही तो नहीं बहती हैं। प्रकृति में कोई चीज कितनी ही मात्रा में क्यों न उपलब्ध हो, किंतु मनुष्य को अपने लिए उतनी ही मात्रा में उसे लेना चाहिए, जितना अनिवार्य हो।
मितव्ययिता से किसी भी वस्तु का उपयोग करने पर आगे की पीढ़ियों के लिए वह संग्रहित रहती है और इस प्रकार वह समाज की अधिकतम आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। सार यह है कि मितव्ययिता को अपनाकर कल्याण को साकार किया जा सकता है।