अखबार के अस्तित्व को नहीं कोई खतरा
Source: सुधीश पचौरी | Last Updated 00:39(05/02/12)
वर्तमान बाजारवाद के दौर में प्रिंट मीडिया इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से बहुत बेहतर है। इसमें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तरह उतनी सनसनीबाजी नहीं होती। चूंकि प्रिंट मीडिया ठहराव का मीडिया है। पाठक उसे घर में पढ़ता है, इसलिए वहां एक जिम्मेदारी अब भी बची है। वैसे इसमें भी कुछ अतिरंजनाएं हैं।
अखबार बेचने मनोरंजनात्मक खबरें ज्यादा बनाई जा रही हैं, लेकिन फिर भी यह माध्यम 80 फीसदी संयत है। इसके विपरीत, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अतिवाद के लक्षण हैं। इसी वजह से यह अपनी विश्वसनीयता खोता जा रहा है। जाहिर है, यदि आप आप खबर को सच से अधिक बताएं, सच से बड़ा कर दें, उसे फुलाएं, तो विश्वसनीयता तो घटेगी। यह अपने आप में एक जालसाजी है। एक और मसला है पेड न्यूज का। फिल्मों के रिलीज से जुड़े प्रोग्राम को देर तक दिखाया जाता है। यकीनन इसमें मीडिया की हिस्सेदारी रहती है।
हर दिन बिग स्टोरी का आना, खबर से दूसरी तरह का अन्याय है। शाहरुख खान की खबर एक घंटे तक चलती है, जबकि आमलोगों की समस्या से जुड़ी खबर 15 सेकंड में निकल जाती है। महानगरों से बाहर की खबर को बहुत कम स्थान मिलता है। यह चलन मीडिया को गैरजिम्मेदार बनाता जा रहा है, इससे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की साख गिरी है। सच तो यह है कि अनेक चैनल आज एक कोण से ही खबर तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं।
आरोप लगाने वाला बड़ा होता जा रहा है, जवाब देने वाला छोटा होता जा रहा है। आरोप लगाने वाले को हीरो बना दिया जा रहा है, जबकि सफाई देने वाले को खलनायक के रूप में देखा जा रहा है। कम-से-कम इस तरह का अतिवाद प्रिंट मीडिया में दिखाई नहीं पड़ता। और यह सुखद बात है कि आज भी खबरों के लिए हिंदुस्तान के बड़े तबके का आधार अखबार ही है।
इंटरनेट 15 करोड़ लोगों से ज्यादा के पास नहीं है, लिहाजा आज भी मध्यम और निम्न वर्ग के लिए अखबार ही जरूरत है। इसके अलावा, लोगों को सुबह चाय की प्याली के साथ अखबार पढ़ने का चस्का अलग है, जिसकी पूर्ति टीवी में खबरें देखकर नहीं होती। अखबार से उनके चित्त को स्थिरता मिलती है। इन सब चीजों से लगता है, अखबार के अस्तित्व को यहां कोई खतरा नहीं है। (अमित स्वप्निल से बातचीत पर आधारित) - प्रसिद्ध मीडिया समालोचक