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माता-पिता की सेवा सर्वोपरि

bhaskar news | Apr 04, 2013, 00:03AM IST

अबुल हसन खिरकानी मुस्लिम संत थे। उनके एक भाई थे। दोनों मिलकर अपनी वृद्ध और बीमार मां की सेवा करते थे। पिता अर्सा पहले गुजर गए थे। दोनों भाइयों के बीच बहुत स्नेह था और दोनों ने कार्य-विभाजन इस प्रकार किया था कि जब एक भाई मस्जिद में नमाज पढऩे जाता, तो दूसरा उस समय मां के पास रहकर उसकी सेवा करता।


फिर पहले के आने पर वह मां की देखभाल करता और दूसरा मस्जिद जाता। मां भी अपने पुत्रों से बेहद प्रसन्न थी। एक बार अबुल हसन के भाई की बारी मां की सेवा करने की थी, किंतु उसका मन मस्जिद जाकर नमाज पढऩे का था। इसलिए उसने अबुल हसन से मां का ध्यान रखने को कहा।


अबुल ने भाई की बात मान ली और भाई को भेज दिया। जब अबुल हसन का भाई मस्जिद में नमाज पढ़ रहा था, तो उसे ऐसा लगा कि खुदा उसके कानों में कह रहे हैं- 'मैंने तेरे भाई को जन्नत अदा की है और उसके कारण तेरे गुनाह माफ कर दिए हैं।Ó


अबुल का भाई हैरान रह गया कि अल्लाह की नमाज को अधिक महत्व देने के बावजूद जन्नत अबुल को मिल रही है। उसने खुदा से पूछा- 'मैंने आपकी प्रार्थना को मां की सेवा से भी ऊपर रखा, तो मेरे कारण भाई का भला होना चाहिए, न कि उसके कारण मेरा। यह अन्याय क्यों?Ó


तब खुदा ने कहा- 'तू मेरी इबादत करता है, जबकि तेरा भाई मां की सेवा करता है, जिसकी मां को बहुत जरूरत है। इसलिए वह तुझसे अधिक पुण्यवान है।Ó खुदा की बात सुनकर उसे अपनी भूल का अहसास हुआ।


वस्तुत: व्यक्ति का सर्वप्रथम दायित्व जन्म देकर पालन-पोषण करने वाले माता-पिता की देखरेख का होता है। यही सच्चा ईश-पूजन है, क्योंकि माता-पिता प्रत्यक्ष रूप में भगवान होते हैं।

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