कई लोगों ने कहा था कि केंटुकी (केएफसी) ढाबों को चलन से बाहर कर देगी, लेकिन ढाबों ने केंटुकी को खदेड़ दिया। कोक और पेप्सी के बावजूद शरबत का अस्तित्व बरकरार है। भारत को कम आंकने की कोशिश न करें।’ ये शब्द एनडीए के पूर्व वित्त मंत्री जसवंत सिंह के हैं।
यह बात उन्होंने 2004 में रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) का समर्थन करते हुए कही थी। ‘हमारी 50 फीसदी आबादी (जिसमें छोटे व्यवसायी, स्ट्रीट वेंडर्स व स्वरोजगार करने वाले लोग शामिल हैं) अपना गुजारा खुदरा व्यवसाय के मार्फत चलाती है। यूपीए सरकार मल्टी-ब्रांड रिटेल में एफडीआई को मंजूरी देकर इन लोगों की रोजी-रोटी छीन लेना चाहती है।’ ये शब्द हैं एनडीए के एक और पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा के, जो उन्होंने पिछले हफ्ते मल्टी-ब्रांड रिटेल में एफडीआई का विरोध करते हुए कहे थे।
2004 और 2011 के बीच ऐसा क्या हुआ कि एनडीए के दो पूर्व वित्त मंत्रियों को ऐसा विरोधाभासी रुख अख्तियार करना पड़ा? देखा जाए तो इस दौरान ज्यादा कुछ नहीं बदला है, सिवाय इसके कि तब अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए सत्ता में था, जबकि अब वह विपक्ष में है और सत्ता में वापसी करने को बेताब है।
यदि यूपीए1 के दौरान एनडीए ने परमाणु सौदे पर कलाबाजी खाकर विदेश नीति के क्षेत्र में वाजपेयी की विरासत को अवमूल्यित किया था, तो यूपीए 2 के दौरान लगता है कि वाजपेयी काल के आर्थिक एजेंडे को ताक पर रखने के प्रयास जारी हैं। जब एनडीए सत्ता में था, तब उसने अर्थव्यवस्था के कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में विदेशी निवेश की अनुमति दी थी, लेकिन आज वह अपने द्वारा प्रेरित आर्थिक सुधारों को ही पीठ दिखा रहा है।
इससे यह भी स्पष्ट होता है कि मौजूदा राजनीति दृढ़ विश्वास के स्थान पर सियासी सहूलियतों से संचालित होती है। संसद में गतिरोध भी यही रेखांकित करता है। बंगाल में मिली कड़ी हार से अब भी उबरने का प्रयास कर रहे वाम दल रिटेल में एफडीआई को ‘गरीब विरोधी’ और ‘वॉशिंगटन द्वारा निर्देशित’ एजेंडा बताकर अपनी परंपरागत विचारधारागत जमीन पुन: प्राप्त करना चाहते हैं, लेकिन तथ्य यह है कि सड़क पर उतरकर संघर्ष करने की वाम की क्षमता क्षीण हो गई है और उसके थके हुए नारे और घिसी-पिटी लफ्फाजियां उसे भविष्य के स्थान पर बीते कल की पार्टी साबित कर रही हैं। लेकिन अगर वाम को अपनी विचारधारा का बंधक कहा जा सकता है तो भाजपा को क्या कहें? वाजपेयी काल में भाजपा ने अपनी विचारधारागत बाध्यताओं को व्यावहारिक प्रशासनिक दृष्टिकोण से संतुलित करने की तत्परता दिखाई थी। लेकिन जब उमा भारती वालमार्ट स्टोर्स को जलाकर राख कर देने की बात करती हैं, जब शीर्ष नेतृत्व राम मंदिर आंदोलन को पुनर्जीवित करने का प्रयास करता है, जब राष्ट्रीय नेता कालेधन को भारत में वापस लाने के संबंध में काल्पनिक धारणाएं व्यक्त करते हैं और जब सुधार-समर्थक नेता भी विदेशी निवेश के परिणामों के बारे में चेताने का प्रयास करते हैं तो आप सोच में पड़ सकते हैं कि क्या भाजपा गुजरे जमाने की भावुक व विध्वंसात्मक राजनीति की ओर लौट रही है।
कांग्रेस की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है। 2जी से लेकर अन्ना और तेलंगाना तक अनेक ‘आत्मघाती गोल’ करने के बाद कांग्रेस नेतृत्व अंतत: कुछ सकारात्मक करना चाहता था, लेकिन उसने विपक्ष और गठबंधन सहयोगियों को तो छोड़िए, अपने सांसदों को भी विश्वास में लेने का कोई गंभीर प्रयास किए बिना जल्दबाजी में रिटेल में एफडीआई को हरी झंडी दे दी। संसद के एक महत्वपूर्ण सत्र के दौरान ऐसा करना खतरे से खाली न था। राजनीतिक कुप्रबंधन और संवादहीनता, यूपीए२ की ये दो विपत्तियां उसका पीछा छोड़ने को तैयार नहीं लग रही हैं।
जहां तक क्षेत्रीय पार्टियों का सवाल है, तो उन्होंने ‘पॉलिटिकल ब्रिंकमैनशिप’ की कला में महारत हासिल कर ली है यानी खेलेंगे नहीं तो खेल बिगाड़ेंगे। डीएमके का उदाहरण लें। वर्ष २क्क्२ में डीएमके के मुरासोली मारन ने एनडीए सरकार के वाणिज्य मंत्री के रूप में रिटेल में सौ फीसदी एफडीआई का समर्थन किया था।
लेकिन आज अगर २जी घोटाले से बुरी तरह चोट खाया डीएमके एफडीआई का विरोध कर रहा है तो केवल यूपीए नेतृत्व को यह याद दिलाने के लिए कि उसके समर्थन को हल्के में नहीं लिया जा सकता। इसी तरह ममता बनर्जी जानती हैं कि वे दिल्ली दरबार की स्थायी सदस्य नहीं रह सकतीं, लिहाजा वे जब तक हैं, तब तक इसका लाभ उठा लेना चाहती हैं। ममता एफडीआई पर प्रपंचात्मक बहस में नहीं पड़ने वालीं। उनके लिए रिटेल क्रांति एक ‘शत्रु’ की शाश्वत खोज का ही एक अंग है। लिहाजा इस तरह के असंगत नजारे सामने आते हैं कि पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री डॉ. अमित मित्रा जहां पहले फिक्की के महासचिव के रूप में रिटेल एफडीआई के लिए लामबंदी कर रहे थे, वहीं अब वे अपने नए अवतार में इससे विपरीत भूमिका में नजर आ रहे हैं।
ममता अकेली नहीं हैं। १५वीं लोकसभा में ऐसे कई योद्धा हैं, जो विवेकसंगत बातों से अधिक महत्व अतिरंजनाओं को देते हैं। नतीजा यह है कि संसद पर एक निष्क्रिय संस्था बनकर रह जाने का खतरा मंडरा रहा है। आंकड़े डराने वाले हैं। १९९६ में ११वीं लोकसभा में हंगामे के कारण चर्चा के कुल समय में से महज नौ फीसदी समय की क्षति हुई थी, लेकिन २क्१क् के शीतकालीन सत्र में २३ दिनों के दौरान लोकसभा की कार्यवाही केवल सात घंटे चल सकी। डर इस बात का है कि २क्११ की स्थिति भी कहीं ऐसी न हो जाए।
ऐसे में क्या इस पर हैरानी की जानी चाहिए कि ‘नो वर्क नो पे’ की लोकप्रिय धारणा बल पकड़ने लगी है? हमारे सांसद भले ही न समझें, लेकिन मतदाताओं में नकारात्मकता की भावना गहराने लगी है। अगस्त में अन्ना के आंदोलन के दौरान इसकी एक झलक मिली थी, जब जनप्रदर्शनों ने संसद की घेराबंदी कर दी थी। हमारे सांसदों को उसे एक चेतावनी की तरह लेना था और विभिन्न विचारों के एक संश्लिष्ट परिवेश का निर्माण करना था। व्यवधानों के दिन अब लद चुके हैं। याद रखें कि अन्ना पहले ही एक ‘सीक्वेल’ की चेतावनी दे चुके हैं। -लेखक आईबीएन 18 नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ हैं।