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कष्ट की मुंडेर पर फूटती हैं आशा की कोपलें

अतुल तिवारी | Sep 05, 2012, 00:35AM IST
 
 

मेरे पड़ोसी के घर के पिछले हिस्से की दीवार पर पीपल का पौधा उगा हुआ है। वह न तो पीपल के उगने के लिए मुफीद जगह है और न तो वहां उसके लायक परिस्थितियां। बारिश को छोड़कर पूरे साल वह नन्हा पीपल अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करता है।

वह यह भी जानता है कि उसकी ‘जमीन’ नहीं है। इसके चलते वह ‘लंबी उम्र’ का ख्वाब नहीं देख सकता। फिर भी वह जिंदा है, क्योंकि वह जिंदा रहना चाहता है। बारिश में पानी की बूंदों के पड़ते ही खिलखिलाती हुई पत्तियां शायद यही कहती हैं, जितने दिन रहें, मस्ती में रहें। यह जिजीविषा ही है, जो हमें जिलाए रखती है। विशाल पीपल जहां हमें मजबूती से खड़ा रहना सिखाता है, वहीं हमेशा हिलती उसकी पत्तियां हमेशा गतिमान होने का संदेश देती हैं।

हीरानंद सच्चिदानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का विख्यात मनोविश्लेषणात्मक उपन्यास है ‘शेखर : एक जीवनी’। इसकी पहली पंक्ति है, वेदना में एक शक्ति होती है। जो यातना में है, वो द्रष्टा हो सकता है। शायद यही मानव जीवन का दर्शन भी है। हम छोटी-छोटी बातों से घबराते हैं, तिल भर कष्टों से आपा खोते हैं। अपने आपको दुनिया का सबसे सताया हुआ मानते हैं। लेकिन क्या आपको कोई सता या कष्ट पहुंचा सकता है? शायद तब तक नहीं, जब तक आप खुद न चाहें।

हमारे जीवन में वही होता है जो हम खुद चाहते हैं। कुछ भी उठाकर देख लें, शक्ति उसी ने अर्जित की है जिसने कमजोरी को भोगा है। ‘निराला’ की राम की शक्तिपूजा में राम की लगातार हार हो रही है। उनके मन में ख्याल आता है कि जीवन में हमेशा सदाचारी रहने के बावजूद उन्हें हार का सामना करना पड़ रहा है, जबकि अनाचारी रावण जीत रहा है। तब जामवंत उनसे कहते हैं, ‘शक्ति की मौलिक कल्पना, करो पूजन। जब तक न हो सिद्धि रघुनंदन।’ मायने यही है कि जीत उसी की होगी, जिसके पास शक्ति है और शक्ति किसी की बपौती नहीं है। उसकी तो साधना करनी पड़ती है। जीवन के सबसे कठोर पलों में ही हमें अपने अंदर की शक्ति का अहसास होता है। उस समय हमारे मन की ऊर्जा, चेतना, शक्ति, हैसियत हिलोरें मारती है।

2,300 साल पहले भी हालात बहुत अच्छे नहीं थे। मगध में नंद वंश का अंतिम राजा घनानंद आकंठ भ्रष्टाचार और भोग-विलास में डूबा था। लोग डरे-सहमे थे। किसी में बोलने का साहस नहीं था। शकटार और चणक (विष्णुगुप्त यानी चाणक्य के पिता) ने जब आवाज उठानी चाही तो उन्हें बंदी बना लिया गया। बंदीगृह में चणक की और घर में उनकी पत्नी की मौत हो गई। चणक विद्रोही करार दिए गए। इन भीषण कष्टों में भी नन्हा विष्णुगुप्त कमजोर नहीं पड़ा। उसने नंद वंश को उखाड़ फेंकने का सपना पाला और सफल हुआ। वही चाणक्य भारत के सार्वकालिक महान मौर्य साम्राज्य के संस्थापक बने।

परिस्थिति कितनी भी विपरीत क्यों न हो और समय चाहे जो हो, व्यक्ति अगर ठान ले तो कोई भी चुनौती मुश्किल नहीं। समय आज भी नहीं बदला है। सरकार आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी है, लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पड़ रहा। नेता सिर्फ बयानबाजी की राजनीति कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नेक हैं, लेकिन दबंग नहीं। सरकार के मुखिया को खामोश नहीं मुखर होना चाहिए। इन सबके बीच मुट्ठीभर लोग अपने फौलादी इरादों से सरकार को उसका चेहरा दिखाने की कोशिश में जुटे हैं। उन्हें किसी का खौफ नहीं। वे सिर्फ भ्रष्ट तंत्र को उखाड़ फेंकने के लिए उद्यत हैं। इतिहास उन्हें किसकी संज्ञा देगा, उन्हें इसकी भी परवाह नहीं। जनता भी भ्रष्टाचार से निजात पाना चाहती है। उसे सच्च नेतृत्व चाहिए। वह जननायक कौन होगा, कहां से आएगा, इस पर फिलहाल सब खामोश हैं। लेकिन यह तय है कि आंदोलन की आंधी से निकला वह जननेता खरा सोना होगा।
 
 
 

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