व्यवस्था में प्रभावी सुधारों की दरकार
हर्ष मंदर | Jan 04, 2013, 01:20AM IST

दिल्ली गैंगरेप की घटना के बाद देशभर में लोग और खासकर युवा सड़कों पर उतरते हुए महिलाओं की सुरक्षा के लिए प्रभावी कानून बनाने और दुष्कर्मियों को सख्त से सख्त सजा देने की मांग कर रहे हैं। ज्यादातर लोगों की मांग है कि दुष्कर्मियों को मौत की सजा हो। हाल ही में आतंकी हिंसा के संदर्भ में भी ऐसी ही मांग उठी थी। दरअसल, आतंकी हमलों या दिल्ली गैंगरेप जैसे किसी प्रकरण की वजह से जब हम बहुत आहत व उद्वेलित होते हैं, तो हमारा यही मानना होता है कि ऐसे आतताइयों को तुरंत फांसी पर लटका देना चाहिए। हमें यह भी लगता है कि ऐसे मामलों में मृत्युदंड जैसा कठोर दंड देने से भविष्य में लोग ऐसा करने से डरेंगे।
हमारा यह गुस्सा जायज है। मगर हमें समग्र तौर पर यह भी देखना होगा कि प्रतिकार और निरोधक, दोनों उपायों के रूप में मृत्युदंड को अमल में लाने से क्या वास्तव में आतंकी हमलों या महिलाओं के खिलाफ हिंसा में कमी आएगी? कुछ नारीवादी व प्रगतिशील समूहों तथा व्यक्तियों ने दुष्कर्म के दोषी व्यक्तियों के साथ उचित न्याय की मांग करते हुए यह भी कहा कि ‘न्याय के प्रति हमारी सोच में मृत्युदंड शामिल नहीं है, जो इस तरह की यौन हिंसा के प्रति न तो निरोधक और न ही प्रभावी या नैतिक प्रतिक्रिया है।’
भारत जैसे कुछ ही देश हैं, जहां मृत्युदंड आज भी प्रभावी है। 141 देशों ने मृत्युदंड पर रोक लगा रखी है। इन राष्ट्रों की ओर से ऐसे कोई साक्ष्य नहीं मिले, जिनसे लगे कि मृत्युदंड पर रोक लगाने के बाद उनके यहां किसी भी तरह के अपराधों में इजाफा हुआ है। लिहाजा यह मानने का कोई आधार नहीं कि बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों को रोकने के लिए प्राणदंड एक प्रभावी व अनिवार्य जरिया है।
विधानों और सबूतों दोनों का मूल्यांकन इंसान द्वारा किया जाता है और इंसान कमजोरियों व पूर्वाग्रहों का शिकार हो सकते हैं। कानूनविद उषा रामनाथन ने न्याय के रास्ते में पड़ने वाले अनेक गर्तो का जिक्र किया है, जिनमें प्रत्यक्षदर्शियों द्वारा की गई गलत पहचान, गलत फॉरेंसिक्स, पुलिस व अभियोजन पक्ष का न्याय के बजाय सजा दिलाने पर ज्यादा जोर, झूठे गवाह, गरीबों के लिए बचाव पक्ष के वकीलों की कमी, झूठे बयान इत्यादि शामिल हैं। दुनिया का कोई भी न्याय तंत्र गलत तरीके से सजा दिलाने की आशंकाओं को समाप्त नहीं कर पाया है। ऐसे में हम किसी ऐसे व्यक्ति की जान लेने को नैतिक तौर पर कैसे जायज ठहरा सकते हैं, जो हो सकता है आखिर में निर्दोष निकले?
आपराधिक न्याय प्रणाली की कमजोरियों और पूर्वाग्रह से परे कुछ ऐसे नैतिक सवाल हैं, जिनसे हमें जूझना होगा। मेरा मानना है कि हर इंसान को सुधरने का एक मौका जरूर देना चाहिए। हर इंसान, यहां तक कि सबसे बेरहम अपराधी (चाहे वह बलात्कारी हो या आतंकवादी अथवा सीरियल किलर या बच्चों का यौन-शोषण करने वाला) जिसने हमें गहरे तक आहत किया हो, हमारी दया का पात्र हो सकता है। एक वकील और प्रचारक के रूप में युग मोहित चौधरी कहते हैं, ‘अगर हम एक ज्यादा मानवीय और करुणाशील समाज बनना चाहते हैं और अपने बच्चों के लिए एक बेहतर दुनिया छोड़कर जाना चाहते हैं तो हमें अपनी खूनी प्रतिकार की वृत्ति को रोकना होगा!’ वह आगे कहते हैं- ‘दया न्याय को नरम बनाती है, जिससे यह कम सख्त और ज्यादा मानवीय होता है।’
हमारे देश में आदिवासी व दलित महिलाओं, असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली औरतों व नि:शक्त महिलाओं के साथ आए दिन यौन उत्पीड़न की घटनाएं होती हैं, जिन्हें खासकर इसलिए निशाना बनाया जाता है क्योंकि ऐसा करने के पीछे लोगों में सजा का डर नहीं होता। हमें अपने कानून में इस तरह की सजाओं का प्रावधान करना होगा, जो लोगों को ऐसे अपराध करने से रोक सके। हमारा रुख सजा-विरोधी नहीं है, वरन हम मृत्युदंड की मुखालिफत करते हैं। गौरतलब है कि बलात्कार के मामलों में सजा सुनाए जाने की दर २६ फीसदी तक कम है, जो बताती है कि यौन हिंसा से जुड़े अपराधी ज्यादातर मामलों में साफ बच निकलते हैं।
आक्रोश और पीड़ा की इस घड़ी में हमें कुछ ऐसे सुधारों की दरकार है, जो काफी समय से लंबित हैं। इनमें काम के बोझ से लदे और कम प्रशिक्षित पुलिस बल में सुधार, जांच व अभियोजन में सुधार और न्यायिक सुधार करना शामिल है। हमें कार्यस्थलों पर यौन हिंसा और यौन उत्पीड़न संबंधी कानूनों में अहम बदलाव करने होंगे। हमें कानून में ऐसे प्रावधान करने होंगे, जिससे कोई भी महिला अपने कार्यस्थल या किसी सार्वजनिक जगह पर किसी भी वक्त निडर होकर आ-जा सके।
मगर इस आक्रोश के बीच हमें अपने भीतर भी झांकना चाहिए। एक व्यक्ति के तौर पर हमें यह देखना होगा कि हम अपने लड़कों की किस तरह परवरिश करते हैं, जहां उनकी सौम्यता को पोषित करने वाली प्रवृत्तियों को हतोत्साहित करते हुए उन्हें आक्रामक, वर्चस्ववादी, हिंसक तथा महिलाओं और लड़कियों के प्रति अनादर का भाव रखना सिखाया जाता है। हिंसा की जो वृत्ति लड़की को गर्भ में ही मार देती है, वही हिंसक वृत्ति अंतत: कई गुना बड़ा रूप लेते हुए महिलाओं के प्रति नफरत और बलात्कार जैसे कृत्यों के रूप में सामने आती है। बलात्कारियों को मौत का खौफ दिखाने से महिलाओं के प्रति हिंसा खत्म नहीं होगी। हमें इसके लिए प्रभावी कानून के साथ-साथ इन्हें प्रभावी ढंग से लागू कराने वाले तंत्र की भी दरकार है। मगर इसके साथ-साथ हमें इस दुनिया में महिलाओं व लड़कियों के लिए समान अधिकार की बात पर भी यकीन करना होगा। हम अपने परिवारों, कार्यस्थलों और सार्वजनिक जगहों का इस तरह पुनर्निर्माण करें, जिससे कि समानता जीवन जीने का एक तरीका बन जाए।
(लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं।)
हर्ष मंदर
डायरेक्टर, सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज






