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अपने दुगरुणों को दूर करते रहें

पं. विजयशंकर मेहता | Jan 03, 2013, 00:41AM IST
 
 

जैसे भौतिक दुनिया में हमें अपने शत्रुओं और प्रतिद्वंद्वियों का परिचय रहता है, उनसे खतरे का आभास होता है, उसी तरह आध्यात्मिक संसार में हमें दुर्गुणों से सावधान रहना होगा। जागरूक लोग दुगरुणों को प्रतिदिन मिटाते रहते हैं।
 
इनके सफाये के लिए वे लगातार सावधान रहते हैं। दुगरुणों पर जरा भी भरोसा न रखें। इन्हें पूरा साफ करें। दुगरुणों के छोटे से छोटे अवशेष भी चिंगारी हैं। इन्हें आग बनने में देर नहीं लगेगी। इन्हें सुविधा यह है कि इनके लिए प्रवेशद्वार खूब हैं। ये तयशुदा रास्ते से अपनी यात्रा पूरी नहीं करते।
 
कई बार तो मनुष्य को पता ही नहीं चल पाता और ये सद्गुणों की आड़ में ही प्रवेश कर जाते हैं। आक्रमण करने के लिए वक्त का इंतजार करना भी इन्हें बहुत अच्छे से आता है। जब हम अपने सद्कर्मो से, सदाचरण से ऊपर चढ़ रहे होते हैं, तब ये हमें पीछे घसीटने में कमी नहीं छोड़ते।
 
एकांत इनकी कर्मस्थली होती है। बड़े-बड़े संयमी एकांत में इनकी मार से धराशायी हो गए। पहाड़ी पर चढ़ रही या उतरने वाली गाड़ी के सारे कलपुर्जे ठीक होना बहुत जरूरी है, समतल जमीन पर तो गड़बड़ी होने से एक बार बचा जा सकता है। दुर्गुणों के साथ जीवन पहाड़ी यात्रा जैसा है। इस दौरान इनके पास नुकसान करने के अवसर ज्यादा होते हैं।
 
इनसे निपटा कैसे जाए? ये संत और भगवंत की उपस्थिति में बेचैन और बाद में निष्क्रिय हो जाते हैं। गुरु इनके लिए बैरियर बन जाते हैं। गुरु के पास एक कला होती है गुरुमंत्र की। उसके कारण हम जीवन को  स्थितियों से समरस बना लेते हैं। हम प्रतिपल एक परमशक्ति से जुड़ जाते हैं और एक वर्जित क्षेत्र हमारे आसपास बन जाता है, जहां दुगरुण हमें देख तो सकते हैं पर निकट आ नहीं सकते।
 
 
 

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