फेरीवाले कारोबार से क्यों इनकार?
हर्ष मंदर
| Nov 16, 2012, 23:24PM IST

हालांकि इन स्ट्रीट वेंडर्स की जिंदगी बेहद कठिन होती है। शरित भौमिक द्वारा नेशनल अलायंस ऑफ स्ट्रीट वेंडिंग ऑफ इंडिया के साथ मिलकर सात शहरों में किए गए सर्वे से पता चला कि उनकी कामकाजी स्थितियां बेहद खराब हैं। उन्हें दिन में दस से बारह घंटे तक काम करना पड़ता है और उनके पास मौसमी प्रकोप से बचने, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा के कोई संसाधन नहीं होते। उनकी आमदनी न्यूनतम मजदूरी से भी कम होती है। उन्हें काम करने के लिए पूंजी कर्ज के रूप में सिर्फ निजी सूदखोरों से ही मिलती है, जो अनाप-शनाप सूद वसूलते हैं।
लेकिन इनकी सबसे बड़ी समस्या व तनाव प्रशासन का प्रतिकूल रवैया है। इन स्ट्रीट वेंडर्स को रोज पुलिस व नगर-निगम वालों के साथ अघोषित लड़ाई लड़नी पड़ती है। सात शहरों में किए गए अध्ययन से इस बात की पुष्टि हुई कि तमाम शहरों में स्ट्रीट वेंडर्स को पुलिस व नगर-निगम वालों को दिहाड़ी या साप्ताहिक घूस के साथ-साथ कई बार भारी जुर्माना भी देना पड़ता है। इसके बावजूद वे कभी भी अचानक खदेड़े जाने के भय से मुक्त नहीं हो पाते। इस अध्ययन का आकलन है कि उनकी कम से कम 20 फीसदी आमदनी तो वसूली करने वाले सरकारी कर्मचारियों के हाथों में चली जाती है।
आधिकारिक जबरन वसूली और असुरक्षा वास्तव में एक दमनकारी व अपारदर्शी लाइसेंस राज से उपजती है, जो प्रभावी ढंग से स्ट्रीट वेंडिंग के तकरीबन तमाम पेशे को अवैध करार देता है। किसी शहर में मनमाने ढंग से लाइसेंसों की एक उच्च सीमा तय कर दी जाती है, जो इतनी कम होती है कि इसमें स्ट्रीट वेंडर्स का बहुत छोटा हिस्सा समायोजित हो पाता है।
मसलन मुंबई में एक अनुमान के मुताबिक 2 लाख हॉकर्स हैं, लेकिन नगर निगम ने महज 14,000 लाइसेंसों की सीमा तय कर दी और ये लाइसेंस भी कई सालों तक जारी नहीं हुए। इस वजह से ज्यादातर वेंडर्स अवैध माने गए। वहां लाइसेंस देने के बदले जमकर वसूली की जाती है। कोलकाता में तो स्थिति और भी खराब थी, जहां कानून के जरिये तमाम स्ट्रीट वेंडिंग को प्रतिबंधित कर दिया गया।
1990 के दशक से घोषित सरकारी नीति निजी कारोबारी उद्यमों को लाइसेंस परमिट राज के चंगुल से मुक्त करने की रही है। सरकारी प्रयासों के तहत नियोजित सेक्टर में कारोबार स्थापित करने के नियमों को सरल बनाने व नियंत्रण-मुक्त करने पर फोकस किया गया। हाल ही में बड़े मल्टी-ब्रांड रिटेल स्टोर्स में विदेशी निवेश लाने के लिए भी नियमों को सरल किया गया। हालांकि स्ट्रीट वेंडर्स की रोजी-रोटी को सरल बनाने के लिए इस तरह के कोई प्रयास नहीं किए गए, जो अब भी अन्यायपूर्ण लाइसेंसिंग व्यवस्थाओं के जाल में फंसे हैं।
ये वेंडर्स शहरी भूमि के सिर्फ २ फीसदी हिस्से पर निर्भर होते हैं, लेकिन कई बार इन स्थलों को भी उनके लिए कानूनी तौर पर प्रतिबंधित कर दिया जाता है। सात शहरों के अध्ययन से पता चला कि सिर्फ भुवनेश्वर व इम्फाल ने अपनी शहर विकास योजनाओं में स्ट्रीट वेंडर्स के लिए प्रावधान किया है, लेकिन दिल्ली, पटना, बेंगलुरू, मुंबई, अहमदाबाद व कोलकाता की विकास योजनाओं में ये नदारद थे। इन योजनाओं में अस्पतालों, पार्को, ऑफिसों, आवासीय कॉलोनियों और बस व रेल टर्मिनलों के लिए जगहें चिन्हित की गईं, लेकिन इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया गया कि इन तमाम जगहों के इर्द-गिर्द वेंडर्स स्वाभाविक तौर पर जमा होते हैं, जो लोगों को सस्ती दरों पर जरूरी चीजें व सेवाएं मुहैया कराते हैं। शहरी योजनाओं में मॉल्स व शॉपिंग कॉम्पलेक्स के लिए जगह है, लेकिन गरीबों द्वारा गरीब के लिए चलाई जाने वाली दुकानों के लिए कोई जगह नहीं है।
एक अहम केंद्रीय विधेयक सदन के समक्ष है, जो इन विषमताओं को दुरुस्त करने का भरोसा देता है। कहा यही जा रहा है कि इस विधेयक का मकसद महज स्ट्रीट वेंडिंग को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि स्ट्रीट वेंडर्स के रोजी-रोटी कमाने के अधिकार को संरक्षित रखना भी है। लेकिन व्यवहार में इस विधेयक का ज्यादातर हिस्सा पंजीयन व लाइसेंसिंग को समर्पित है और इसमें प्रस्तावित व्यवस्था अब भी अपारदर्शी व भ्रामक लगती है। यह स्ट्रीट वेंडर्स के लिए अपने व्यवसाय का पंजीयन कराने के लिए कहता है। नगर-निगम स्ट्रीट वेंडर्स के लिए मूल निवासी जैसी अनेक शर्ते पूर्वनिर्धारित कर सकते हैं, जिनके लिए दस्तावेजों की जरूरत पड़ सकती है और जिन्हें गरीब स्ट्रीट वेंडर्स पेश नहीं कर पाएंगे। इसके अलावा वे उच्च कीमतों वाले मौजूदा वेंडिंग बाजारों को ‘नॉन-वेंडिंग’ जोन घोषित कर सकते हैं।
यह स्थिति तभी बदल सकती है, जबकि कानून यह निर्धारित करे किज्यादातर वेंडर्स रजिस्टर्ड हों और उनके विक्रय केंद्रों तथा बिक्री क्षमताओं का निर्धारण पारदर्शी प्रक्रिया द्वारा किसी ऐसी एजेंसी द्वारा किया जाए, जिसमें वेंडर्स के प्रतिनिधि भी शामिल हों।
कुल मिलाकर हमें अपने शहरों का स्वरूप इस तरह तैयार करना होगा, जिसमें व्यापक शहरी गरीब समुदाय वैध साझेदार के तौर पर शामिल हो सके। इसके अलावा हमें आर्थिक विकास का ऐसा नया खाका भी खींचना होगा, जिसे न सिर्फ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुनाफों, बल्कि लाखों कामकाजी गरीबों के प्रतिष्ठानों से भी गति मिले।
(लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं।)
हर्ष मंदर
राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य






