राजनीतिक-सामाजिक महोत्सव की इस बेला में
Source: एम.जे. अकबर | Last Updated 00:33(29/01/12)
चाहे स्वाद का मामला हो या भाषा का, नमक के गुण-धर्म अनंत हैं। नमक, सेना नामक उस संस्थान में सम्मान का इशारा करने वाली प्रणाली का प्रतीक है, जो साम्राज्यों और उपनिवेशियों को साथ जोड़े रखता है। यदि आप अपने नमक पर सच्चे थे, तो आपने जिसका नमक खाया, उसके प्रति वफादार बने रहे।
यानी, आप नमकहलाल थे। इसका उल्टा, नमकहराम अभी भी बड़ा चुभने वाला इल्जाम है, हालांकि इस जमाने के नैतिक मूल्य प्राचीन वचनों की बजाय, व्यापारिक दृष्टिकोणों से निर्धारित होते हैं। आज के जॉब मार्केट में कोई कंपनी को दी गई जबान की बजाय, अगले वेतन के प्रति ज्यादा वफादार होता है।
कहावत की तरह ही नमक, संभावित मुकाबले या विरोध में सभ्य व्यवहार का प्रतीक भी बन चुका है। आपको सिखाया जाता है कि अनाप-शनाप या बकवास का विरोध करने की जगह उसे चुटकीभर नमक के साथ निगल जाएं। पिछले हफ्ते ब्रिटिश लेबर पार्टी के नेता भावशून्य एड मिलीबैंड ने एक जनमत संग्रह पर आपत्ति जताते हुए इसका एक बदला हुआ दिलचस्प रूप गढ़ डाला।
ब्रिटेन में भले ही मुर्दनी नहीं, पर हताशा के माहौल के बावजूद जनमत संग्रह ने सत्तारूढ़ कंजरवेटिव पार्टी को काफी आगे रखा था। मिलीबैंड ने कहा कि उन्होंने इस खबर को थोड़ी-सी शकर के साथ गटका। पूरे आसार हैं कि उन्हें अवचेतन में वह कड़वी दवा याद होगी, जो मम्मी बचपन में उन्हें जबरदस्ती खिलाती थीं और संभवत: उसके बाद मिलने वाला जैम भी, जो मिठास देता था। जब सच कड़वा होता है, तो कोई भी उसमें नमक नहीं भरता। थोड़ी-सी शकर ही एकमात्र तसल्ली होती है।
मार्च के पहले सप्ताह में जब ताजा दौर के विधानसभा चुनावों के परिणाम आएंगे, तो ढेर सारे राजनेता जो इस क्षण में नमक के जरिए खुद को सहज कर रहे हैं, वे शकर की डली के लिए आशाहीन हो जाएंगे। आज नमक उन्हें अपने द्वारा कराए गए जनमत संग्रहों को पचाने में मदद कर रहा है।
जिन फर्मो ने इसके लिए मतदान कराए हैं, उन्हें वही सब बता रही हैं, जो वे सुनना चाहते हैं। और यही इस तथ्य का एकमात्र स्पष्टीकरण है कि क्यों पंजाब में कांग्रेस और अकाली, दोनों जीत की उम्मीद कर रहे हैं। दोनों एक साथ सही नहीं हो सकते। क्या मत संग्रह का जिम्मा लेने वाली फर्म का छल और पार्टियों का भ्रम मायने रखता है? पूरी तरह तो नहीं।
इस साल मतदाता ऐसी अशांत मानसिकता में हैं कि विवेचना का दायरा काफी हद तक व्यापक हो चुका है। मत संग्रह कोई सामान्य अंकगिणत नहीं है। यहां दो और दो हमेशा चार नहीं होते। यह तो बीजगणित है, जिसमें समीकरण में ढेर सारे कोष्टक हैं।
महज एक उदाहरण देने के लिए बताएं, तो एक महत्वपूर्ण ढुलमुल कारक है, किसी पार्टी के समर्थकों का जनसांख्यिकीय घनत्व। यदि ये समर्थक बहुत व्यापक क्षेत्र में फैले हैं, तो उनकी गिनती तो बड़ी हो सकती है, लेकिन जीती जाने वाली सीटों की गिनती नहीं। यह मायावती द्वारा उत्तरप्रदेश में झेली जा रही समस्याओं में से एक है।
दलितों और अन्य दरिद्र जातियों के बीच उन्हें जबरदस्त समर्थन है, लेकिन उनकी मौजूदगी जिलों के एक खास गुच्छे में समाहित होने की बजाय पूरे प्रदेश में है। इसलिए हो सकता है कि वे 200 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर दूसरे नंबर पर रहें और सौ से कुछ ज्यादा सीटें ही जीत सकें। इसके विपरीत, मुस्लिम वोट नतीजों को तय करने वाले असरदार कारक हैं, क्योंकि वे पश्चिम से पूर्व के जिलों के एक अर्धवृत्त में सिमटे हैं।
विवेचना की यह चाल वादक सिद्धांत से परिचय कराती है : जो वादक को भुगतान करता है, धुन उसी के हिसाब से बजती है। संख्याओं को दांतों के बीच रखने वाले लोग अपने ग्राहकों को हतोत्साहित करने के इच्छुक नहीं हैं, इसलिए उन्हें करना बस इतना ही है कि आंकड़ों की व्याख्या अपने हिसाब से करें। कुछ भी हो, राजनीतिक दल चुनावों के बाद याद नहीं रखते। विजेता आनंद में मग्न होते हैं और हारने वाले बेहद हताश।
छोटे-छोट जनसांख्यिकीय क्षेत्र अनुमानों को आसान बना देते हैं। लेकिन यूपी बहुत मुश्किल है। उत्तरप्रदेश में आठ पंजाब, 20 उत्तराखंड, 40 गोवा और 80 मणिपुर फिट हो सकते हैं। यूपी में चुनाव, यानी मिनी आम चुनाव। इसलिए कोई हैरानी नहीं कि यहां पिछले तीन दशकों में ऐसा कोई भी चुनाव नहीं हुआ, जिसने नतीजे ने कोई हैरानी न दी हो। एक मत-संग्रह का कहना है कि भाजपा और कांग्रेस, दोनों तीन अंकों तक पहुंच सकते हैं, जो राजनीतिक वातावरण को पूरी तरह बदल कर रख देगा। लेकिन इसमें धूर्तता की गंध भी है और यही कारण है कि किसी ने इसे बहुत ज्यादा महत्व नहीं दिया। हम तर्कसंगत निश्चितता के साथ भविष्यवाणी कर सकते हैं कि मायावती के वोट कटे हैं, लेकिन किसी के पास भी वास्तविक आइडिया नहीं है कि इस कटाव का विस्तार किस हद तक है और ये कटे हुए वोट कितनी सारी दिशाओं में जाएंगे।
2007 में जिन ब्राह्मणों ने उनके साथ सुनियोजित कारणों से गठबंधन किया था, वे भाजपा या कांग्रेस की ओर जाने चाहिए। लेकिन खेल में बहुत ज्यादा छोटे-छोटे चक्कर होते हैं, जो किसी भी पैटर्न को तब्दील कर देते हैं। अपने मुस्लिम वोट बैंक के साथ उभरने वाली पीस पार्टी एेसी ही तब्दीलियों पर निर्भर है। इसने इस उम्मीद के साथ गैर-मुस्लिम उम्मीदवार खड़े किए हैं कि आगे ठेलने के लिए वे अपनी जाति के पर्याप्त वोटर ले आएंगे। ऐसा कोई फामरूला खोज पाना लगभग असंभव ही है, जो उत्तरप्रदेश में चुनाव सरीखी किसी महागाथा में समय-समय पर खड़े हो जाने वाले तमाम उप-कथानक समाहित कर ले।
अनिश्चितता, लोकतंत्र का मूल भाव है। यदि मत-संग्रह ही काफी होते, तो हमें चुनावों की जरूरत ही क्यों पड़ती? भारत में चुनाव राजनीतिक-सामाजिक महोत्सव होता है। यह धरती का नमक है। -लेखक द संडे गार्जियन के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं।