मुद्दा अपराधों की नई श्रेणी का
मुमकिन है कि संघीय अपराधों की अलग श्रेणी बनाने का दूसरे प्रशासनिक आयोग का सुझाव केंद्र और राज्यों के बीच टकराव का मुद्दा बन जाए, लेकिन इसे इस रूप में लेने की बजाय सभी पक्षों को देश की सुरक्षा संबंधी चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए इस मुद्दे पर विचार करना चाहिए।
अगर राजनीतिक दलों में सुरक्षा को सियासी नफा-नुकसान की गणना से ऊपर रखने पर सहमति बन जाए, तो फिर इस मुद्दे पर इसके व्यापक संदर्भ में चर्चा हो सकती है। प्रशासनिक सुधार आयोग की पांचवीं रिपोर्ट में संघीय अपराधों की एक श्रेणी बनाने का सुझाव दिया गया था।
रिपोर्ट जून 2007 में पेश की गई, जिसे कुछ समय पहले केंद्र ने राज्य सरकारों को भेजा। आयोग की सिफारिश है कि जिन अपराधों का दायरा अंतरराज्यीय है या जिनका संबंध राष्ट्रीय सुरक्षा से है, उन्हें एक नए संघीय कानून के तहत लाया जाए। आयोग के मुताबिक संगठित अपराध, आतंकवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरनाक गतिविधियां, हथियारों या मानव की तस्करी, राजद्रोह, प्रमुख सार्वजनिक व्यक्तित्वों की हत्या और गंभीर आर्थिक अपराध ऐसे जुर्म हैं, जिनके लिए अलग श्रेणी बनाई जा सकती है।
यह सुझाव भी दिया गया है कि अशांति की स्थिति में केंद्र किसी राज्य में केंद्रीय बल तैनात करने का निर्णय खुद ले सकता है। लेकिन भारतीय संविधान में सार्वजनिक व्यवस्था और पुलिस राज्य सूची के विषय हैं। साथ ही किसी राज्य में बिना उसके अनुरोध या सहमति के केंद्रीय बल तैनात नहीं किए जा सकते। अब राज्यों को इन सुझावों के बारे में अपनी राय देनी है।
कुछ समय पहले राष्ट्रीय आतंकवाद-निरोधक केंद्र (एनसीटीसी) पर अनेक राज्यों ने जैसा रवैया अपनाया, उसे देखते हुए आशंका है कि कई राज्य सरकारों की इस सुझाव पर कड़ी प्रतिक्रिया होगी। अच्छी बात है कि अब केंद्र सरकार एनसीटीसी पर राज्यों के साथ सहमति बनाने की कोशिश में है। ऐसी ही कोशिश की जरूरत इन सुझावों के मामले में भी होगी। इस सिलसिले में ध्यान में रखने की बात यह है कि बदलते समय और उभरती चुनौतियों के साथ नई व्यवस्थाएं बनानी पड़ती हैं। प्रशासनिक सुधार आयोग ने अगर सुझाव दिए हैं, तो उसकी ठोस पृष्ठभूमि है। इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।






