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भाव बदलेंगे, स्वभाव बदलेंगे; सालभर गहराएंगे रहस्य-रोमांच

कल्पेश याग्निक | Dec 21, 2012, 03:24AM IST
भाव बदलेंगे, स्वभाव बदलेंगे; सालभर गहराएंगे रहस्य-रोमांच
विजय भाषण के भाव ही अलग होते हैं। विशेषकर तब जब वह नरेंद्र दामोदरदास मोदी का हो। पहली बार उनमें एक बदलाव दिखा। उन्होंने कहा : ‘.एक इंसान के नाते.. कभी मुझमें कोई ग़लती हो गई हो.. कोई कमी रह गई हो.. तो छह करोड़ गुजरातवासियों, मैं आपसे मन से क्षमा चाहता हूं। मोदी और माफी? निश्चित मांगी। दो-दो बार। अंतर केवल इतना रहा कि उन्होंने ऐसा जोर-शोर से किया। विनम्रता दिखाई किन्तु अपने आक्रामक अंदाज के साथ। 
 
मोदी स्वभाव से ही आक्रामक हैं। इसके लिए उन्हें बांहें चढ़ाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। यूं भी वे आधी बांह वाले कुर्ते ही पहनते हैं। और पहनते हैं सादा चश्मा जिसके पीछे उनकी आंखों की छटपटाहट छुपाए नहीं छुपती। संभवत: छुपाना चाहते भी नहीं। सहज मंदहास कर ही तो डाला जब कार्यकर्ताओं ने उन्हें ‘प्रधानमंत्री’ के रूप में देखने के नारे लगाए।
 
‘ठीक है, आप चाहते हैं तो मैं दिल्ली.. एक दिन के लिए हो आता हूं 27 तारीख को। और वही जयजयकार! किन्तु इससे उत्तेजित नहीं होते मोदी। काग-दृष्टि। हर पल इधर-उधर। बको-ध्यानम्। लक्ष्य स्पष्ट : प्रधानमंत्री पद। जिसे विनम्रता की भाषा में इन दिनों ‘राष्ट्रीय राजनीति’ कहा जा रहा है।
 
और यही मोदी-लक्ष्य सारे देश की राजनीति को बदल कर रख देगा। इस विजय और विजय भाषण में उनके तेवरों के साथ ही आरंभ हो गया दशक का सर्वाधिक रोमांचक अध्याय। सुबह टीवी चैनलों पर जिस तरह अंकों में उलटफेर होते रहे, उतने ही उलटफेर हर नेता की प्रतिक्रिया में देखे गए। जैसी कि आशंका थी, या आशा भी कह सकते हैं, कांग्रेस से अधिक बौखलाहट भाजपा में दिखी। भाजपा श्रेष्ठि वर्ग में।
 
श्रेष्ठि वर्ग, आवश्यक नहीं कि ‘रूटलैस वंडर्स’ यानी आधारहीन अजूबों के वर्ग को ही कहते हों। कुछ का आधार भी है। ग़जब के भाव बदले। 112-113 सीटों पर डॉ. चंदन मित्रा ने कहा ‘प्रधानमंत्री आदि विषय पर मुझसे न पूछें, मैं केंद्रीय नेता नहीं हूं।’ रुझान जब एक बार 122 पर पहुंच गया तो तत्काल कहने लगे : निश्चित मोदी प्रधानमंत्री बनने के योग्य हैं। पार्टी प्रवक्ता राजीव प्रताप रूडी ने ‘मॉडेस्ट’ जीत कहकर सबको हैरत में डाल दिया। फिर सफाई दी कि जीत तो ग़जब ही है, ‘मॉडेस्टी’ दिखाते हुए उन्होंने सहज कह दिया था।
 
इसका अर्थ स्पष्ट है : हड़कम्प। उधर कांग्रेस में बौद्धिक दंभ बढ़ता ही जा रहा है। वित्तमंत्री पी. चिदंबरम् के अनुसार तो ‘गुजरात में भी कांग्रेस ही जीती है!’ यानी दो सीट बढ़ने को ‘जीत’ मानकर सिद्ध किया कि उत्तरप्रदेश की बुरी हार से उन्होंने कुछ भी नहीं सीखा। या लक्ष्य ही इतना निम्न रखा था। इसका भी अर्थ स्पष्ट है : सोने का अभिनय करते रहना।
 
 
भाजपा-कांग्रेस और अन्य पार्टियों से परे एक बड़ा वर्ग और भी है। धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों का। समाज विज्ञानियों का। राजनीतिक विश्लेषकों का। उन्हें मोदी की हैट्रिक लोकतंत्र के लिए खतरा लग रही है। संविधान खतरे में दिख रहा है। हालांकि यह सोच ही संविधान ही आत्मा के खिलाफ है। इन विश्लेषकों को ‘भारतीयता’ के विरुद्ध लग रहा है गुजरात का वोट! इन सभी को निर्ममता से खारिज करने के सभी तर्क और तथ्य मोदी के पास मौजूद हैं। किन्तु सुनेगा कौन? और क्यों? क्योंकि जिनका जो स्वभाव है, वह बदलेगा क्यों? 
 
यही चलेगा अब पूरे साल। भाव और स्वभाव। यदि गैर-मोदी भाजपा को अपना लक्ष्य पूरा करना है, तो उसे अपने चेहरे के भाव बदलने पड़ेंगे। इतनी बड़ी विजय के बाद के मोदी, बड़े आत्मविश्वास से खड़े होंगे। दिल्ली में भी! लोगों में उनकी अपील अलग ही है : यह किसी को पसंद आए-न आए, किन्तु है सच। उधर मोदी को तो स्वभाव भी बदलना होगा। कुछ ज्यादा ही, ‘आई, मी, मायसेल्फ’ हैं वे। राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा पहले ही खंडित है। 
 
मोदी के देशभर में प्रशंसक अवश्य हैं, कार्यकर्ता नहीं। आधार नहीं। और यही कारण है कि मोदी ने अपना पहला भाषण हिन्दी में दिया। चूंकि वे भली-भांति जानते थे कार्यकर्ताओं को नहीं ‘राष्ट्र को संबोधित’ कर रहे हैं। कार्यकर्ताओं को इसी बीच उन्होंने गुजराती में ही टोका। कई आधारहीन अजूबे उन पर ‘पार्टी से बड़ा हो जाने’ का आरोप लगाकर कुछ सफल भी हो सकते हैं। वैसे यह आरोप नहीं, सच्चई है। सबसे बड़ा रहस्य बना हुआ है कि मोदी अल्पसंख्यकों को राष्ट्रीय स्तर पर कैसे मनाएंगे? ‘सद्भावना’ यात्रा का गुजरात में खूब फायदा मिला। किन्तु एनडीए घटकों में पहले सद्भावना बनानी होगी। संघर्ष और भी हैं और वास्तविक हैं। नटयोगी होना पड़ेगा। जबकि ‘छोटे सरदार’ हठयोगी हैं। 
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