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प्रियंका और सक्रिय राजनीति

 
Source: राजदीप सरदेसाई   |   Last Updated 00:26(10/02/12)
 
 
 
 
वर्ष 1999 में हमें एक ‘टेलीविजन घटना’ का अनुभव हुआ था। हम अमेठी में सोनिया गांधी के चुनाव प्रचार को कवर कर रहे थे, जहां हमारी भेंट उनकी पुत्री प्रियंका से हुई। अगले कई घंटों तक हम उनके साथ उनके संसदीय क्षेत्र का तूफानी दौरा करते रहे। तब टीवी कैमरे इतनी तादाद में नहीं हुआ करते थे, लिहाजा ‘साउंडबाइट्स’ के लिए किसी तरह की कश्मकश भी नहीं हुई।


प्रियंका का व्यक्तित्व टीवी कैमरों के अनुरूप था : आकर्षक, सम्मोहक और सहज। उन्होंने हमसे अपनी पारिवारिक विरासत के बारे में विस्तार से बात की और यह स्पष्ट था कि वे अपनी सार्वजनिक भूमिका का मजा ले रही हैं। शायद न्यूज चैनलों से वह उनकी पहली भेंट थी, लेकिन उन्होंने एक भी चूक नहीं की। हम सभी उनकी शख्सियत से मंत्रमुग्ध थे।


आज तेरह साल बाद भी लगता नहीं कि उनमें कोई बदलाव आया हो। उनकी शालीन मुस्कराहट का सम्मोहन बरकरार है। वे लोगों से अद्भुत आत्मीयता के साथ मिलती हैं और मीडिया के सामने अपनी बात रखने को तत्पर रहती हैं। गतिशील मीडिया (जो कि अब एक सर्कस में तब्दील हो चुका है) आज भी उनके द्वारा कहे जाने वाले हर शब्द पर नजरें जमाए रखता है। उनसे इतने सालों से लगातार एक ही सवाल पूछा जा रहा है : ‘आप सक्रिय राजनीति में कब आ रही हैं?’ और उनका जवाब भी सालों से वही है।


तेरह साल पहले उन्होंने कहा था कि वे अपनी मां के लिए चुनाव प्रचार कर रही हैं और अब वे कहती हैं कि वे तो केवल अपने भाई राहुल की मदद करना चाहती हैं। और इसके बावजूद हम इसी उम्मीद में लगातार उनसे यह सवाल पूछते रहते हैं कि शायद, किसी दिन वे ‘हां!’ कह देंगी।


प्रियंका के प्रति हमारे इस सम्मोहन के क्या निहितार्थ हैं? इससे पहली बात जो पता चलती है, वह यही है कि हमारे सार्वजनिक जीवन में करिश्माई नेताओं का कितना अभाव हो गया है। हमारे थके हुए, चुके हुए, वयोवृद्ध नेताओं से प्रियंका की छवि बिल्कुल विपरीत है। चूंकि वे चुनावों को छोड़कर आम तौर पर सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आतीं, इसलिए उनके व्यक्तित्व का रहस्य भी अभी बरकरार है।


वे कभी-कभार किसी पेज थ्री इवेंट में नजर आती रहती हैं, लेकिन चुनावों के समय तो वे पेज थ्री के स्थान पर पेज वन की सुर्खियों में छा जाती हैं। और चाहे हम इस बात को स्वीकार करें या न करें, लेकिन प्रियंका के प्रति हमारे आकर्षण का एक कारण राजनीतिक वंशावलियों में हमारी रुचि भी है। प्रियंका की शैली से लेकर उनका पहनावा तक उनकी दादी इंदिरा गांधी की याद दिलाता है और अतीत की घटनाओं से उनकी तुलना करने के लिए केवल यही तथ्य काफी है।


हो सकता है कि इंदिरा गांधी राजनीतिक रूप से ध्रुवीकृत नेत्री रही हों, लेकिन यह भी सच है कि वे स्वातं˜योत्तर भारत की संभवत: सबसे सुविख्यात राजनेता हैं। हमारी स्वतंत्रता की ६क्वीं वर्षगांठ पर कराए गए एक सर्वेक्षण में भी यह साफ हो गया था कि खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी देशवासी अगर किसी एक नेता से अपने को सबसे अधिक जोड़कर देख पाते हैं, तो वे इंदिरा गांधी ही हैं।


राहुल और प्रियंका के बीच भी तुलना की जाती रही है। जहां राहुल की राजनीतिक शैली एनजीओ एक्टिविज्म और कॉपरेरेट प्रबंधन का मिश्रण है, वहीं प्रियंका के व्यक्तित्व की मृदुल आत्मीयता को देखकर लगता है कि आम आदमी अपने को उनसे अधिक सरलता से जोड़कर देख सकता है। मीडिया के लिए भी जहां राहुल से संवाद कर पाना कठिन होता है, वहीं प्रियंका हमेशा संवाद के लिए तत्पर लगती हैं।


लेकिन इसके बावजूद सक्रिय राजनीति में प्रियंका के प्रवेश की हमारी गहरी आकांक्षा का यही अर्थ है कि हम मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य की वास्तविकताओं को ठीक से समझ नहीं पा रहे हैं। हां, प्रियंका का व्यक्तित्व करिश्माई है, लेकिन अब करिश्माई व्यक्तित्व की परंपरागत परिभाषा भी बदल रही है।


मिसाल के तौर पर नीतीश कुमार के पास लालू यादव जैसा वाकचातुर्य भले ही न हो, लेकिन आज अनेक बिहारियों के लिए वे एक रोल मॉडल हैं। एक दशक पहले शीला दीक्षित को टेलीविजन पॉलिटिक्स के दौर के लिए अनुपयुक्त माना जा सकता था, लेकिन इसके बावजूद आज शीलाजी दिल्ली की प्रिय वरिष्ठ नेत्री हैं। वास्तव में आज सुप्रबंधन ही किसी व्यक्तित्व के करिश्मे की कसौटी बन गया है।


इतना ही नहीं, पिछले दो दशक में उत्तर प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य में भी नाटकीय बदलाव आया है। इंदिरा गांधी या केंद्र में कांग्रेस के वर्चस्व वाले दौर के बाद इस प्रदेश के मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग भी परिपक्व हुआ है। गांधी-नेहरू परिवार की साख का आकलन भी अब उन नई सामाजिक शक्तियों के संदर्भ में किया जाना चाहिए, जो पिछले बीस सालों में पूरे प्रदेश में उभरी हैं।


यहां तक कि अमेठी-रायबरेली-सुल्तानपुर पट्टी में भी कांग्रेस 2007 के चुनाव में 15 में से सात सीटें ही जीत पाई थी। कह सकते हैं कि उत्तर प्रदेश में राजनीतिक जमींदारी की संस्कृति का अंत हो रहा है और अब केवल उपनाम के आधार पर ही कोई व्यक्ति यह नहीं मान सकता कि उसे राजनीति में कुछ विशेषाधिकार प्राप्त होंगे।


राहुल गांधी ने भी पिछले कुछ माह में उत्तर प्रदेश के सियासी अखाड़े में खुद को पूरी तरह झोंक देने का जोखिम उठाया है। वे पिछले तीन माह में 130 से भी अधिक रैलियों को संबोधित कर चुके हैं। यह इस बात का संकेत है कि अब राहुल एक ऐसे जननेता के रूप में उभरने का प्रयास कर रहे हैं, जो महज सत्ता के अहातों में कैद नहीं रहना चाहता। देखा जाए तो राहुल की तुलना में प्रियंका ने अभी उत्तर प्रदेश की राजनीति में न के बराबर सक्रियता दिखाई है। मायावती और मुलायम जैसी ठोस चुनौतियों का सामना करने के लिए चतुराईपूर्ण साउंडबाइट्स को सबसे उपयुक्त माध्यम नहीं माना जा सकता।


लेकिन, हो सकता है कि शायद प्रियंका इसी तरह का जीवन बिताना चाहती हों। इतने सालों में क्या हमने कभी इस बात पर विचार किया है कि शायद वे सक्रिय राजनीति में आना ही न चाहती हों? या वे राजनीति से दूर रहकर केवल एक अच्छी गृहिणी या मां की भूमिका निभाना चाहती हों?


कुछ माह पहले ही उन्होंने बाघों पर एक बहुत सुंदर कॉफी टेबल बुक तैयार की है। हो सकता है वे राजनेत्री के स्थान पर वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर बनना चाहती हों। या फिर शायद हम ही इस बात को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं कि भारतीय राजनीति के प्रथम परिवार का कोई सदस्य ऐसा भी हो सकता है, जो राजनीति से दूरी बनाए रखना चाहे।

(लेखक आईबीएन 18 नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ हैं।)
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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