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जीवन को ऊर्जा से भर देती है कृतज्ञता

पं. विजयशंकर मेहता | Dec 08, 2012, 00:12AM IST
हम जब पूजा-पाठ करते हैं, किसी परमशक्ति से जुड़े होते हैं, तो भीतर से बिल्कुल साफ-सुथरे होने लगते हैं। जीवन को देखने की हमारी दृष्टि बदल जाती है, लेकिन जैसे ही हम अहंकार से जुड़ते हैं भीतर का साफ-सुथरापन खत्म हो जाता है। उसमें कई चीजों का मिश्रण होने लगता है।
 
हमारे सोचने की शक्ति, बोलने का भाव, करने का तरीका सब दूषित होने लगता है। अहंकार गिराने का एक तरीका है - कृतज्ञता व्यक्त करते रहें। हनुमानभक्त श्रीरविशंकरजी रावतपुरा सरकार सरल भाषा में व्यक्त करते हैं- व्यक्ति के लिए धन्यवाद देने से ज्यादा महत्वपूर्ण कोई दूसरा कर्तव्य नहीं है। जो व्यक्ति अपने वर्तमान उपहारों के प्रति कृतज्ञ नहीं है, वह भविष्य में प्राप्त होने वाली उपलब्धियों के प्रति आभारी नहीं होगा।
 
जो दृष्टिकोण, जो विचार कृतज्ञता का द्वार बंद कर देता है, वह जीवन को कड़वा और निर्थक बना देता है। ऐसी स्थिति में स्वार्थपरक दृष्टिकोण शीघ्र ही जीवन पर प्रभावी हो जाता है और जीवन के उस द्वार को बंद कर देता है, जिसमें से अच्छाइयां प्रवेश करती हैं। कृतज्ञता एक ऐसी शक्ति है, जो जीवन को ऊर्जा से भर देती है। व्यक्ति की अपनी शांति के तीन शत्रु होते हैं - अतीत की गलतियों पर पछतावा करना, भविष्य की समस्याओं और संकटों पर चिंता करना तथा वर्तमान में प्राप्त उपहारों के प्रति कृतज्ञ न होना।
 
अहंकार और कृतघ्नता का आपस में गहरा संबंध है। यदि आप गर्व करते हैं तो निश्चित है कि आप कृतज्ञ हो ही नहीं सकते। हमारे द्वारा बोले गए सहानुभूतिपूर्ण शब्दों में कुछ भी खर्च नहीं होता, लेकिन उनसे हासिल बहुत कुछ होता है। हमें ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि हे ईश्वर! मुझे एक कृतज्ञ हृदय और प्रदान करें।
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