वर्ष 19777 में सत्ता में आई जनता सरकार को अब तकरीबन भुला दिया गया है, लेकिन चार बातें ऐसी हैं, जिसके लिए उसे याद रखा जाना चाहिए। पहली बात तो यही कि उसने इस मिथक को तोड़ा कि भारत के मतदाता कांग्रेस के अलावा किसी अन्य पार्टी को कम से कम केंद्र की बागडोर तो नहीं सौंपेंगे।
दूसरी बात यह कि आपातकाल के संशोधनों से क्षतिग्रस्त हुआ भारतीय संविधान पुन: किंचित अपने मूल स्वरूप में प्रतिष्ठित हो सका। तीसरी बात यह कि भारतीय रेलवे ने एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए लकड़ी के सख्त स्लीपर्स के ऊपर दो इंच का फोम लगाया। और चौथी बात यह कि उसने कुछ ऐसे योग्य पेशेवरों को सचिव बनाया, जो लोकसेवक नहीं थे।
संविधान की पुन: प्रतिष्ठा का श्रेय जहां काफी हद तक तत्कालीन कानून मंत्री शांति भूषण को था, वहीं आम आदमी के लिए रेलयात्राएं अधिक आरामदेह बनाने का विचार तत्कालीन रेल मंत्री मधु दंडवते का था। लेकिन इंजीनियर मैनुएल मेनेजेस को रक्षा उत्पादन सचिव, कृषि विज्ञानी एमएस स्वामीनाथन को कृषि सचिव और रसायन विज्ञानी लोवराज कुमार को पेट्रोलियम सचिव बनाने का श्रेय किसे जाना चाहिए? काफी हद तक इसका श्रेय तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को था, जो स्वयं एक अद्भुत प्रशासक थे और जिन्हें पता था कि सही काम के लिए उचित व्यक्ति का क्या महत्व होता है।
वे यह भी जानते थे कि ये तीन विशेषज्ञ उन्हें सौंपे गए दायित्वों के पूरी तरह योग्य थे। यकीनन, वे सभी बहुत दक्ष थे (स्वामीनाथन के पास कैम्ब्रिज से पीएचडी की डिग्री थी, जबकि कुमार ऑक्सफोर्ड में भारत के पहले रोड्स स्कॉलर थे) और उन्हें प्रशासनिक अनुभव भी था।
जनता सरकार के पतन के साथ ही पुरानी व्यवस्था पुन: कायम हो गई। 1980क् में इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी के बाद सरकार में शीर्ष स्तर पर पेशेवरों को नियुक्त करने के प्रयोग को तिलांजलि दे दी गई। जो लोग पेट्रोलियम सेक्टर के बारे में जानकारी रखते हैं, वे बता सकते हैं कि लोवराज कुमार देश के श्रेष्ठतम और निष्ठावान पेट्रोलियम सचिव थे, लेकिन उन्हें एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता के निर्देश पर सचिव पद से हटा दिया गया, क्योंकि उन्होंने उस नेता द्वारा प्रस्तावित कुछ संदिग्ध सौदों की फाइल को मंजूरी नहीं दी थी।
जनता सरकार के पतन के तीन दशक बाद आज फिर वह प्रयोग दोहराना प्रासंगिक हो सकता है। निश्चित ही भारतीय प्रशासनिक सेवा में कुछ बहुत काबिल व्यक्ति अपनी सेवाएं दे रहे हैं, लेकिन क्या सरकार में सचिव या अतिरिक्त सचिव के स्तर पर नियुक्ति के लिए लोक प्रशासक होना अनिवार्य होना चाहिए? अंर्तसबद्ध और निरंतर जटिल होती जा रही दुनिया में निश्चित ही सार्वजनिक क्षेत्र में योग्य पेशेवरों के प्रवेश का स्वागत किया जाना चाहिए।
बहरहाल, आज लगभग सभी वरिष्ठ पदनियुक्तियां आईएएस अधिकारियों के लिए आरक्षित हैं। अलबत्ता विज्ञान, प्रौद्योगिकी और परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में कुछ अपवाद जरूर हैं, लेकिन एक बड़े पैमाने पर तकनीकी विशेषज्ञता के क्षेत्र में भी आईएएस का दबदबा है।
पर्यावरण मंत्रालय के पहले दो सचिव ऐसे वैज्ञानिक थे, जिन्हें प्रशासनिक अनुभव भी था, लेकिन पिछले बीस सालों में लगभग कोई वैज्ञानिक इस मंत्रालय में सचिव नहीं बना है। इसी तरह जहां कई बेहतरीन अर्थशास्त्रियों-प्रशासकों ने पूर्व में वित्त सचिव के रूप में सेवाएं दी हैं, वहीं अब यह पद भी आईएएस के लिए आरक्षित हो गया है।
आईएएस के वर्चस्व को पूरी तरह भले ही समाप्त न किया जाए, लेकिन उसे कम जरूर किया जाना चाहिए। सरकार में सर्वाधिक महत्वपूर्ण पदों पर सर्वश्रेष्ठ व्यक्तियों को नियुक्त करने का सबसे अच्छा तरीका है विश्वसनीय विकल्पों को बढ़ाना। मिसाल के तौर पर शिक्षा सचिव पद के लिए सरकार जरूर एक अनुभवी आईएएस के नाम पर विचार कर सकती है, लेकिन साथ ही इसके लिए किसी ऐसे कुलपति के नाम पर भी विचार किया जा सकता है, जिनके विश्वविद्यालय ने उनके कार्यकाल के दौरान खासी प्रगति की हो।
यह विचार हमारे प्रधानमंत्री को पसंद आ सकता है। लेकिन केवल इसीलिए नहीं कि लोकसेवा में प्रवेश करने से पहले वे भी एक पेशेवर थे। डॉ मनमोहन सिंह नवंबर 1976 में आपातकाल के अंतिम चरण में वित्त सचिव नियुक्त किए गए थे। यहां याद रखा जाना चाहिए कि जब जनता सरकार सत्ता में आई तो उसने उन्हें पद पर बनाए रखा। तत्कालीन वित्त मंत्री एचएम पटेल इस बात को समझते थे कि इस क्षेत्र में पार्टी के प्रति प्रतिबद्धता से भी ज्यादा महत्व पेशेवर दक्षता का है।
मनमोहन सिंह वर्ष 1980 तक वित्त सचिव के पद पर रहे। लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में अपने सात वर्षो के कार्यकाल में डॉ सिंह ने केवल एक ही वरिष्ठ पेशेवर को लोकसेवा में पदनियुक्त किया है। वे हैं नंदन नीलेकणी। जबकि नीलेकणी ने कई प्रतिभावान युवाओं को प्रेरित किया है कि वे निजी क्षेत्र छोड़कर उनके साथ काम करें। मैं स्वयं को इस योग्य नहीं समझता कि यूआईडीएआई प्रोजेक्ट की तकनीकी जटिलताओं का आकलन करूं, लेकिन बेंगलुरू, दिल्ली, बिहार और अन्य जगहों पर परियोजना में काम कर रहे लोगों के साथ विस्तार से बात करने के बाद मैं उनकी राष्ट्रीय और सामाजिक प्रतिबद्धता की पुष्टि कर सकता हूं।
मैं कई ऐसे अन्य चिकित्सकों, वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और विधिवेत्ताओं को भी जानता हूं, जो निजी क्षेत्र के स्थान पर सार्वजनिक क्षेत्र के लिए सहर्ष काम करना चाहेंगे, बशर्ते उन्हें आश्वस्त किया जाए कि तुच्छ राजनीतिक हस्तक्षेपों से उन्हें मुक्त रखा जाएगा और दक्षतापूर्ण कार्य करने पर उन्हें बड़ी जिम्मेदारियां सौंपकर प्रोत्साहित किया जाएगा।
पिछले सालभर में ऐसे अनेक घोटालों का खुलासा हुआ है, जिसमें कैबिनेट मंत्री भी लिप्त पाए गए हैं। इससे प्रधानमंत्री की छवि को भी क्षति पहुंची है। यदि वे अपने कार्यकाल के शेष समय में निष्ठावान और प्रबुद्ध व्यक्तियों को प्रशासनिक तंत्र में सम्मिलित करते हैं, तो पुन: जनता का विश्वास प्राप्त कर सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो यह न केवल उनके लिए, बल्कि कदाचित देश के लिए भी शुभ होगा। - लेखक जाने-माने इतिहासकार हैं।