अन्ना हजारे की उपलब्धियां बहुत बड़ी हैं। उन्होंने दुनिया की सबसे दुर्गम और अभेद्य सरकारों में से एक में सकारात्मक रूप से सेंध लगाने में कामयाबी पाई। उन्होंने युवाओं के दिल में बदलाव की आकांक्षा की एक चिंगारी पैदा की।
उन्होंने भारत की जनता में मूल्यों की पुन: प्रतिष्ठा करने की प्रक्रिया भी प्रारंभ की, जिसकी सख्त जरूरत थी। हां, हममें से अधिकांश अब भी भ्रष्ट हैं, लेकिन हममें कुछ ऐसे भी हैं, जो भलाई की राह पर चलना चाहते हैं।
अन्ना की वजह से हमारे भीतर भलाई की चाह मजबूत हुई है। यकीनन, कोई भी बदलाव रातोंरात नहीं होता, लेकिन समय के साथ हम निश्चित ही बेहतर व्यक्ति और बेहतर समाज बन सकते हैं। हालांकि हमें इन उपलब्धियों की कीमत चुकानी पड़ी है।
हमने मुश्किलों और उपद्रवों का एक लंबा दौर देखा। हमने अड़ियलपन, अभद्रता और दोनों ही पक्षों की ओर से अति आक्रामकता जैसी कुरूप प्रवृत्तियां भी देखीं। फासले मिटाने के लिए यह रवैया ठीक नहीं। एक आदर्श दुनिया में लोग विवेकसंगत होंगे और अपनी ताकत या स्थिति को दरकिनार कर उचित कदम उठाएंगे।
बहरहाल, हम एक ऐसी दुनिया में जी रहे हैं, जो फिलवक्त इस आदर्शवाद से कोसों दूर है। लेकिन इसके बावजूद मौजूदा हालात में उम्मीद की किरण देखी जा सकती है। इस आंदोलन में हमारे युवाओं ने सड़कों पर उतरकर दूसरी जातियों और धर्मो के लोगों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया।
वे शांतिपूर्ण रूप से सामने आए और शालीनता के साथ एक अधिक न्यायपूर्ण समाज की मांग की। यह हम सभी के लिए गौरव का क्षण है। लेकिन यहां मैं यह भी कहना चाहूंगा कि अंग्रेजीभाषी भारतीय बुद्धिजीवियों के एक वर्ग द्वारा अन्ना की आलोचना करने से मैं स्तब्ध हूं।
अन्ना का आंदोलन सफल रहा है, लेकिन यदि हमारे बौद्धिक कुलीनों ने उनके आंदोलन का समर्थन किया होता तो उनकी स्थिति और मजबूत होती। हम एक व्यापक सर्वसम्मति का निर्माण कर पाते। निश्चित ही लोगों को अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार है और हमें इसका सम्मान भी करना चाहिए, लेकिन मैंने सामान्यत: अन्ना विरोधी विचारों को पक्षपातपूर्ण और पूर्वग्रहग्रस्त पाया है। शायद इसकी वजह है अन्ना की पृष्ठभूमि और उनकी अपरिष्कृत शैली। लेकिन मौजूदा हालात में ये बातें अप्रासंगिक हैं।
मैंने यह भी पाया कि स्थिति को ठीक से समझने का प्रयास नहीं किया जा रहा। अन्ना के विरोध में सबसे ताकतवर दलील यह थी कि संसद की अवहेलना नहीं की जा सकती और न ही की जानी चाहिए। अंग्रेजी खबरिया चैनलों पर होने वाली बहसों में कर्कश स्वरों में ये बातें कही गईं।
यकीनन, इसमें कोई संदेह नहीं कि संसद और संविधान का सम्मान किया जाना चाहिए। लेकिन इस तरह की संस्थाएं एक बुनियादी धारणा के आधार पर संचालित होती हैं और वह है जनता का विश्वास। यदि जनता का भरोसा डिग जाए तो ऐसी कोई संस्था संचालित नहीं हो सकती। हमें ऐसे प्रयास करने चाहिए कि संसद में जनता का भरोसा पुन: स्थापित हो।
मैं एक छोटा-सा उदाहरण देना चाहूंगा। हम अपने जेब में कागज के जो नोट लिए घूमते हैं, उनका मूल्य केवल तभी तक है, जब तक हम उन्हें मूल्यवान मानते हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं, जब किसी देश की जनता ने अपनी मुद्रा में भरोसा गंवा दिया।
यह आमतौर पर तब होता है, जब सरकार बिना सोचे-समझे नोट छापती रहती है और इस कारण उसका तेजी से अवमूल्यन होता है। ताजा उदाहरण जिम्बाब्वे का है। 2008 में जिम्बाब्वे में ऐसी स्थिति आ गई थी, जब हर 24 घंटे में कीमतें दोगुनी हो रही थीं।
सरकार उच्च मूल्य वर्ग में नोट छापती रही और एक डबलरोटी की कीमत 10 अरब जिम्बाब्वे डॉलर्स तक पहुंच गई। अंतत: यह स्थिति आ गई कि लोगों ने स्थानीय मुद्रा से पल्ला झाड़ा और वस्तु विनिमय प्रणाली अपना ली।
कल्पना करें यदि उस समय जिम्बाब्वे के कुलीन बुद्धिजीवी टीवी पर आकर कहते कि देश की मौद्रिक प्रणाली का सम्मान किया जाना चाहिए तो क्या कोई उनकी बात मानता? मुझे नहीं लगता। ऐसे मौकों पर सरकार को स्वीकारना पड़ता है कि उसने गैरजिम्मेदाराना रूप से नोट छापे और अब उसे स्थिति को नियंत्रित करने की जरूरत है। मौद्रिक संकट से जूझ रहे देश यही करते हैं, लेकिन जिम्बाब्वे ने ऐसा नहीं किया। नतीजा यह रहा कि आज भी वहां के लोग विदेशी मुद्रा पर ही अधिक भरोसा करते हैं।
भारत के राजनेता और खासतौर पर भारत की सरकार भरोसे के इसी संकट से जूझ रही है। जनता अब सरकार पर भरोसा नहीं करती। सरकार के बयानों से हालात और बदतर हो गए हैं। सरकार लगातार कहती है कि भ्रष्टाचार की समस्या से निजात पाना जरूरी है, लेकिन वह खुद इसके लिए लगभग कुछ नहीं करती।
सरकार ने अन्ना की टीम से भी कुछ वादे किए थे, लेकिन बाद में वह मुकर गई। सरकार कहती है कि अन्ना को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया है और पूरा देश जानता है कि यह एक सफेद झूठ है। प्रधानमंत्री भी ‘गठबंधन की मजबूरियों’ की बातें करते हैं। आखिर वह मजबूरी क्या है: सच के साथ समझौता?
हमारे राजनेताओं ने अपने रवैये की यह कीमत चुकाई है कि अब लोग उन पर भरोसा नहीं करते। जनता का विश्वास जीते बिना नियमों का हवाला देने से कुछ नहीं होगा। एक अच्छा लोकपाल सरकार की विश्वसनीयता भी बढ़ाएगा। वास्तव में आज जनता या सिविल सोसायटी से भी अधिक सरकार को लोकपाल की दरकार है।
इसमें जनता को भी अपना योगदान देना होगा। हम जाति, धर्म या क्षेत्र के आधार पर वोट नहीं दे सकते। अपने नेता के चयन के लिए हमारा एकमात्र मानदंड होना चाहिए उसकी गुणवत्ता। अगर हम संसद में योग्य, भरोसेमंद और ईमानदार लोगों को चुनकर भेजेंगे तो संसदीय प्रणाली अपने आप विश्वसनीय और सम्मानपूर्ण हो जाएगी। समय आ गया है, हम यह साबित कर दें कि हमारे राष्ट्रीय चिह्न् पर अंकित शब्दों ‘सत्यमेव जयते’ के क्या मायने हैं।