वक्त की पाबंदी की मुश्किलें
Source: खुशवंत सिंह | Last Updated 01:13(17/09/11)
जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़ती जा रही है, लेटलतीफी को बर्दाश्त करने की मेरी क्षमता भी कम होती जा रही है। यदि कोई व्यक्ति मुझसे मिलने आ रहा हो और उसे देरी हो जाए तो मैं उससे मिलने से ही इनकार कर देता हूं। दूसरे लोगों की पार्टी में भी देरी से आने वाले लोगों से मैं रूखा बर्ताव करने लगता हूं।
मुझे लगता है ऐसे मौकों पर मुझे केवल अपने काम से काम रखना चाहिए, लेकिन इसके स्थान पर मैंने लेटलतीफी के प्रति यह दुराग्रह पाल लिया है और मुझे इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ रहा है। जहां एक तरफ इससे मेरा मूड खराब रहने लगा है, वहीं मेरे दोस्त भी अब मुझे खब्ती समझकर मुझसे कतराने लगे हैं।
हालत यह हो गई है कि अब मेरा काम किसी मामूली घड़ी से नहीं चलता। अब मैं स्टॉप वॉच का इस्तेमाल करने लगा हूं। ऐसे कई लोग हैं, जो वक्त के बहुत पाबंद रहते थे, लेकिन उन्होंने कभी इसे लेकर डींगें नहीं हांकी। इनमें सबसे विख्यात हैं महात्मा गांधी। उनकी धोती के साथ लटकती हुई घड़ी की तस्वीर तो सभी ने देखी होगी।
जर्मन दार्शनिक इमैन्युअल कांट भी वक्त की पाबंदी के लिए मशहूर थे। जीवित हस्तियों में मैं लॉर्ड स्वराज पाल का नाम लेना चाहूंगा। वे समय के इतने पाबंद हैं कि समय से पहले आने को भी ठीक नहीं समझते हैं। वे जब भी मुझसे मिलते हैं, तो तब तक अपनी कार में बैठे रहते हैं, जब तक कि वह समय न हो जाए, जो हमने मुलाकात के लिए तय किया था।
लेकिन मुझे लगता है कि वक्त की पाबंदी की मेरी जो धारणा है, उसे मैं अब दूसरों पर भी लादने लगा हूं। मैंने अपने इस व्यवहार के कारण कई लोगों को ठेस पहुंचाई है। मुझे एक वाकया याद आता है। एक बार मैं औरंगाबाद की एक होटल में ठहरा था। रिसेप्शन डेस्क के समीप एक धर्मगुरु की आदमकद तस्वीर थी। होटल का पूरा वातावरण बहुत शांत था। वहां ठहरे लोगों में से अधिकांश सैलानी थे, जो अजंता-एलोरा की गुफाएं देखने आए थे।
इस होटल से अजंता और एलोरा दोनों ही बहुत दूर नहीं थे। होटल में ठहरे लोगों ने दोपहर और रात्रि के भोजन के लिए अलग-अलग समय तय कर रखा था, लेकिन मुझे यह मंजूर नहीं था। मुझे अपना खाना ठीक समय पर चाहिए था और मैंने मैनेजर से यह कह भी दिया। बाद में मुझे पता चला कि उस मैनेजर ने मेरा नाम रख दिया था : ‘वक्त का पाबंद सिंह’। निश्चित ही यह कोई शिकायत नहीं थी, लेकिन मैंने इसे भी एक शिकायत की ही तरह लिया।
जीवन का सफर:
इस विशाल शहर में
मेरा एक दोस्त हुआ करता था।
शहर तो बेछोर है
लेकिन समय की थी सीमा।
दिन और हफ्ते गुजरते रहे
और देखते ही देखते
एक पूरा साल भी बीत चला।
इस दौरान एक बार भी मैंने
अपने दोस्त का चेहरा नहीं देखा।
मानो जिंदगी एक दौड़ हो,
जिसमें जो सबसे तेज दौड़ता है,
उसके साथी पीछे छूट जाते हैं।
कामयाबी एक किस्म का अकेलापन है।
वह जानता है कि मैं आज भी
उसे उन दिनों की ही तरह चाहता हूं
जब मैं बेधड़क दे दिया करता था
उसके दरवाजे पर दस्तक।
लेकिन तब हम नौजवान थे
और अब हम तजुर्बेदार लोग हैं।
मूर्खतापूर्ण दौड़ से बेहाल,
नाम कमाने की जद्दोजहद से तंग।
‘कल’ मैंने कहा
‘कल मैं जिम से मिलने जाऊंगा,
यह जताने के लिए
मैं अब भी उसे भूला नहीं हूं।’
लेकिन कल जब भी आता है
आज बनकर आता है
और आज के पास कोई वक्त नहीं होता।
देरी को दूरी बनते देर नहीं लगती।
जो बहुत पास हैं, वे भी बहुत दूर हो जाते हैं।
और तभी, एक दिन मेरे पास टेलीग्राम आता है :
‘आज जिम की मौत हो गई।’
और बस इतना ही।
हमारी तमाम दौड़-धूप का हासिल
बस इतना ही :
कि हम अपने करीबी दोस्तों को गंवा देते हैं।
पैसा: मेहनतकश इसे कमाते हैं, शाहखर्च इसे उड़ा देते हैं, बैंकर्स इसे उधार देते हैं, जालसाज इसे नकली बना देते हैं, टैक्स इसे निगल जाते हैं, बुजुर्ग इसे अपने पीछे छोड़ जाते हैं, कंजूस इसे बचा लेते हैं, अमीर इसे दो-दूनी-चार कर देते हैं, लुटेरे इसे हड़प लेते हैं, जुआरी इसे दांव पर लगा देते हैं, लेकिन हम इसका इस्तेमाल कर सकते हैं और हमें यही करना चाहिए।