बालक गोबिंद की विरक्ति
Bhaskar News
| Sep 24, 2012, 00:02AM IST
बालकों का नटखट स्वभाव भी उनमें नहीं था और न ही उनकी तरह प्रतिस्पर्धा करने की ललक थी। उनकी माता उनका यह आचरण देखकर बड़ी हैरान होती थीं, किंतु उन्हें स्वाभाविक रूप से बहुत स्नेह भी करती थीं। एक दिन उनकी मां के मन में उन्हें सोने के कंगन पहनाने का विचार आया। उन्होंने अति सुंदर कंगन बनवाए और गोबिंद सिंह को बड़े लाड़ से पहना दिए। कुछ देर बाद मां ने देखा कि बालक गोबिंद के एक हाथ का कंगन गायब है। मां परेशान हो गई।
बालक गोबिंद से पूछा तो वह उन्हें नदी किनारे ले गए और दूसरा कंगन भी नदी में डाल दिया यह कहकर कि पहला भी मैंने नदी में डाला है। जब मां ने ऐसा करने का कारण पूछा तो बालक गोबिंद बोले- मां मुझे गुरुनानक के बताए रास्ते पर चलना है। आपने यदि मुझे मोह-माया की बेड़ियों में बांध दिया तो मैं यह कैसे कर पाऊंगा? बालक गोबिंद सिंह के ये उद्गार उनके महान विरक्त जीवन का संकेत कर रहे थे। सार यह है कि आसक्ति भौतिकता की ओर खींचती है, जिससे आध्यात्मिक लक्ष्य पूर्ण नहीं हो पाते। अत: जिनकी प्रवृत्ति शरीर से अधिक आत्मा के संतोष की ओर है, वे मोह-माया से दूर ही रहते हैं।






