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बादल तो हैं पर बारिश के रंग गायब हैं..

यास्मीन सिद्दीकी | Aug 13, 2012, 00:56AM IST
 
 

तुम कहां चले गए? इतना ढूंढ़ा मैंने तुम्हें, लेकिन तुम मिले ही नहीं। यह आसमान बहुत विशाल है। शायद तुम मुझसे लुका-छिपी खेल रहे हो। बड़ा मजा आता है न तुम्हें मुझे परेशान करने में! आज भी घटा बहुत है। लगता है बादल तो आज फिर जमकर बरसेंगे। लेकिन अब तो बस रौद्र रूप वाले गहरे काले बादल ही हैं।

मेरे बचपन के कपसीले बादलो, मैं तुम्हें बहुत मिस करती हूं। तुम्हें याद है, बारिश के दिनों में सारे बच्चे तुम्हारा कितना इंतजार करते थे? और जैसे ही तुम आसमान की उस नीली चुनरिया को ढंक कर कुछ-कुछ दूधिया, हल्का-सा स्लेटी बना देते थे, हमारा बालवृंद भी तुम्हारा स्वागत करने के लिए घर से निकलकर गलियों और मैदान की ओर दौड़ पड़ता था। तुम भी कुछ कम नहीं थे। हमें देखते ही बच्चों में बच्चा बन जाते थे।

हम सब मिलकर बादलों में न जाने कौन-कौन से आकार और आकृतियां खोजा करते थे। कभी इन बादलों में अपनी लाठी लेकर आगे बढ़ता कोई बूढ़ा बाबा दिखाई देता था, तो कभी हाथी या चौकड़ी भरता हिरन। हम एक-दूसरे से पूछा करते थे कि बादलों में वह जोकर कहां है या फिर बूढ़ी अम्मा चरखा किधर कात रही है। हम अभी कोई अनुमान ही लगा रहे होते कि तुम झट से अपनी आकृतियां बदल लेते। आज भी बारिश है, घनघोर घटाएं छाई हुई हैं, लेकिन अब आसमान में प्रदूषण की कालिमा भी इसमें शामिल है। तभी तो बादलों का कपसीला और गुलाबी गालों सरीखा रंग कहीं खो-सा गया लगता है।

प्रदूषण-मुक्त उन बादलों के तो कहने ही क्या थे! रुई के फाहे जैसा बादल तो बड़ा ही शर्मीला था। हमेशा सिमटकर पहाड़ों की चोटियों में समा जाता। और हल्के पीले-गुलाबी बादल! वो तो फिजा को पूरा ही बदलकर रख देते थे। ऐसा लगता था, जैसे कुदरत इतरा रही हो। लेकिन अब ऐसे बादल मानो रूठकर पहाड़ों की ओट में ही कहीं छिप गए हैं। खुद तो गए ही, इंद्रधनुष के सात रंगों को भी लेते गए। बारिश और हल्की-हल्की धूप में आने वाला सतरंगी इंद्रधनुष जो न जाने कब रंगों का पाठ पढ़ा जाता था, वह भी तो रूठ गया लगता है। और तो और, अब जुगनू भी रात के अंधेरे में टिमटिमाना ही भूल गए। कितने शैतान थे वो.. सभी के सोने का इंतजार करते और घुप अंधेरा होते ही अपने साथियों के साथ हंसते-गाते आ धमकते थे। हम सभी उन्हें पकड़कर अपनी जादू की डिबिया में रख लेते थे। हम उन्हें पिटारे में कैद कर लेते थे, इसलिए वे रूठ गए। शायद यही नाराजगी पहली बारिश में आने वाली रेडवेलवेट माइट उर्फ ‘रामजी की डोकरी’ की भी है। वो देखने में इतनी ‘स्टाइलिश’ लगती थी, जैसे नया मखमली रेनकोट पहनकर आई है।

ओ प्यारे बादल! जाने कैसे हमारे पलक झपकते ही तुम आसमान में अलग-अलग आकृतियां बना देते थे। कभी ऐसा लगता जैसे ऊपर कोई बैलगाड़ी खींचकर ले जाई जा रही है, तो कभी कोई बस नजर आती। बारिश और बादलों के साथ वाला यह छोटा-सा रंग-बिरंगा संसार यादों में ही सिमटकर रह गया है। पहले फूलों की रानी तितली आंखों से ओझल हुई, फिर जुगनू और अब ये कपसीले बादल भी। अब बारिश आती है, तो प्रदूषण और रौद्र रूप वाले काले बादल ही सारे आसमान को घेर लेते हैं। गौर से देखेंगे तो अहसास कर पाएंगे कि जैसे ये भी हमसे खफा-खफा से हैं। तभी तो अब बादलों के बीच न कोई आकृति झांकती दिखती है, न ही कोई बादल बच्चों के साथ लुका-छिपी खेलता है और न ही रंगों का ज्ञान कराने कोई सतरंगी इंद्रधनुष आता है।

बहरहाल, हम पहल करके तो देखें। संसार को इनके अनुकूल बनाएं। फिर शायद बरसों से रूठे प्यारे बादल वापस आ जाएं.. जुगनू भी टॉर्च लिए इस जगह को फिर ढूंढ़ लें, जहां का रास्ता वे बरसों पहले भूल गए हैं।
 
 
 

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