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तेरी आवाज ही तेरे होने की गवाही है..

 
Source: अमित शर्मा   |   Last Updated 00:33(07/02/12)
 
 
 
 
कल 8 फरवरी है। राजस्थान या हिंदुस्तान ही नहीं, पूरी दुनिया के संगीत प्रेमियों के लिए यह दिन यादगार है। 8 फरवरी 1941 की सुबह 8 बजे श्रीगंगानगर में जगजीत का जन्म हुआ था। मटका चौक के पास पतराम की चिकड़ी (किराए के मकान) में वे जन्मे थे और वो भी एक देसी दाई के हाथों। दाई का नाम था मोहरली।

10 अक्टूबर 2011 की सुबह 8 बजकर 10 मिनट पर जगजीत का देहांत मुंबई के लीलावती अस्पताल में ब्रेन हेमरेज के इलाज के दौरान हुआ। यदि जगजीत जीवित होते तो यह उनका 71वां जन्मदिन होता। अपने 70वें जन्मदिन पर मुंबई में हुए समारोह में जगजीत ने अगले एक साल में 100 शो करने का इरादा बनाया था, पर यह शतक पूरा हो न सका। जगजीत की गजलों की अंतिम शाम 20 सितंबर को देहरादून में सजी, जहां सेलाकुई के इंडियन पब्लिक स्कूल में उन्होंने गाया। 23 सितंबर की शाम मुंबई के माटुंगा स्थित षणमुखानंद हॉल में उनका गुलाम अली के साथ कार्यक्रम था, पर इसी रोज उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया।

जगजीत के नाम यूं तो देश में पहला डिजिटल मीडिया का एलबम बियॉन्ड टाइम लाने का रिकॉर्ड है, लेकिन उन्हें जाना जाता है गजल को आम आदमी के कानों से होकर जुबां तक वाया दिल लाने वाले कलाकार के रूप में। द अनफरगेटेबल के जरिए हिंदुस्तान की अवाम का दिल जीत लेने वाले जगजीत गजल को महफिलों, मुशायरों से निकालकर आम श्रोता की गुनगानहट तक ले आए। गजलों के फिल्मीकरण के कारण वे आलोचना के शिकार भी हुए, लेकिन प्रयोग सफल रहा था।

जगजीत ने शुरुआत में मुंबई में मुफलिसी के साथ संघर्ष किया। शादी-ब्याह, नाइट पार्टीज में गाया। गाने के बाद पैसे मिलना तो दूर, खाने तक को न पूछा जाता, लेकिन इन्हीं से पहचान भी मिली। लता मंगेशकर ने पहली बार इन्हें पार्टी में ही सुना, खुशवंत सिंह ने भी। खुशवंत सिंह के विशेष स्तंभ में जगजीत के लिए लिखी चंद पंक्तियां इस उभरते हुए कलाकार के लिए वरदान बनीं। खुशवंत सिंह ने 1970 के दशक में इलस्ट्रेटेड वीकली में लिखा था कि पंजाब से एक गायक आया है। लोग कहते हैं वो दिलीप कुमार जैसा दिखता है और मेहदी हसन-सा गाता है। मैंने उसे सुना है।

वो दिलीप कुमार से ज्यादा सुंदर है और मेहदी हसन से अच्छा गाता है। वो मुंबई पर छा जाने वाला है। उसे फिल्मों में बतौर अभिनेता प्रयास करना चाहिए। मनोज कुमार स्टारर फिल्म ‘अमन’ में उन्होंने एक साइड रोल भी किया था। तब तक वे सरदार ही थे। द अनफरगेटेबल रिकॉर्ड जारी होने से पहले उसके एलबम के कवर के लिए जगजीत क्लीन शेव हुए थे, जिससे परिवार में खासा तूफान भी आया था। 19 वर्षीय बेटे विवेक, जिसे घर में बाबू कहकर पुकारते थे, की सड़क हादसे में मौत के बाद जगजीत का परिवार हिल गया था। तब से आज तक चित्रा ने गाया नहीं, जगजीत ने गाकर गम भुलाया। श्रोता जगजीत के संगीत सफर को दो भागों में बांटते हैं। शुरुआती सफर रूमानी अंदाज में और बेटे की मौत के बाद दर्द के आगाज में। बेटे की मौत के बाद ‘लाइफ आफ्टर दैथ’ की बातें भी जगजीत के मुंह से सुनने को मिलीं। जगजीत परिवार का कहना था कि बाबू उनसे बातें करता है, वे उसे मृत्यु के बाद भी महसूस करते हैं।

वर्ष 2002 में जगजीत सिंह की बायोग्राफी बियॉन्ड टाइम प्रकाशित हुई थी। अब उनके देहांत के बाद उनसे जुड़े कुछ छुए-अनछुए पहलुओं पर नई पुस्तक जग जीते जगजीत लिखी गई है। सौभाग्य से इस लेख के लेखक को इस पुस्तक को लिखने का अवसर मिला है।

लोग कहते हैं, जुनून की कोई परिभाषा नहीं होती। गलत कहते हैं लोग। जुनून की परिभाषा जगजीत होती है। जगजीत का संगीत होता है। यह गाना बंद कीजिए कि कहां तुम चले गए..। वो कहीं नहीं गए हैं। और अब अंत में छोटे भाई करतारसिंह का बड़े भाई जगजीतसिंह को श्रद्धांजलि देता ये शे’र..तेरी आवाज से रिश्ता कोई इलाही है/तेरी आवाज तेरे होने की गवाही है।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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