हम इंतजार करेंगे कि कयामत हो..!

बारिश के दिनों में पुल की रैलिंग को ध्वस्त कर बहता पानी, किसी बस्ती में हाहाकार मचाता जल प्रलय.. यह वही पुल है, जिससे गर्मियों में नीचे की ओर झांकने पर बस सूरज की रोशनी में चमचमाती रेत ही नजर आती है। यह वही बस्ती है, जहां पानी की चंद बूंदों की खातिर अक्सर खून की नदियां बह जाया करती हैं। ऐसे पुल और ऐसी बस्तियां शायद हम सबके शहरों में मिल जाएंगी।
जब पानी की जरूरत नहीं, तब पानी ही पानी और जब कंठ प्यासे हों, तब जलसंकट? हे भगवान, इतना मिस-मैनेजमेंट तो ठीक नहीं! अगर इस दुनिया में होने वाले हर कार्य के लिए भगवान जिम्मेदार हैं तो ठीक है, हम सब उसी पर छोड़ देते हैं। लेकिन ऐसा है नहीं, क्योंकि हमने सब कुछ भगवान भरोसे भी नहीं छोड़ा। ऐसा करते तो कहीं बेहतर था। प्रकृति अगर अपने हिसाब से चलती तो शायद आज जो स्थिति है, वह नहीं होती। हमने प्रकृति मंे दखल दिया, अब प्रकृति हमें बेदखल कर रही है - कभी हमारे मकानों से, कभी हमारी बस्तियों से तो कभी हमारे अपने गांवों-कस्बों से। संयुक्त राष्ट्र के एक आकलन के अनुसार इस दुनिया में अब तक सात करोड़ से भी अधिक लोग केवल पानी की तलाश में अपना घर छोड़ चुके हैं तो हर साल असम में ब्रह्मपुत्र या फिर बिहार में कोसी नदी की आई बाढ़ हजारों को बेघर कर देती है।
यह किसी दैवीय शक्ति का कुप्रबंधन कदापि नहीं है। अगर आज मेरा शहर बारिश में बस्तियों में भरने वाले पानी से हलाकान हो रहा है तो इसके लिए कौन जिम्मेदार हैं? क्या केवल वरुण देवता? या वे प्रभु जिनके हाथों में शहरों या कस्बों के प्रबंधन की बागडोर है? एक समय था, जब कई दिनों की झड़ी के बाद भी गलियों या घरों में पानी अमूमन नहीं भरता था। वह पानी या तो नालियों से होता हुआ पड़ोस में बह रही किसी नदी में मिल जाता था या फिर मिट्टी में जज्ब हो जाता था। नालियां अब भी हैं, लेकिन उनसे जुड़े नालों पर तो मकान तान दिए गए हैं। बेचारा पानी अब कहां जाए? मिट्टी अगर भूलकर भी दिख जाए तो उसे भी कांक्रीट से पाट दिया जाता है। सड़कों के किनारे खड़े इक्का-दुक्का पेड़ों का मिट्टी में खुलकर सांस लेने का यह हक भी हमने छीन लिया है।
जिन गलियों में आज पानी है, कुछ माह बाद वे पानी की बूंदों के लिए तरसेंगी। क्या यह हमारे नाकारापन की निकृष्टतम परिणति नहीं है कि बारिश से इतना पानी मिलने के बावजूद हमारे यहा कई कंठ प्यासे ही रह जाते हैं? इजरायल समुद्री पानी को भी इस्तेमाल करने लायक बना रहा है और हम इस्तेमाल करने लायक पानी को समुद्र में मिलाने के लिए मानो कमर कसकर खड़े रहते हैं। आखिर इस पानी को थामने के लिए क्या किया जाए कि वह न प्रलय बने और न हमें गर्मियों में बेसहारा छोड़ जाए। अगर नदी जोड़ परियोजना को लेकर बहुत विवाद हैं तो चलिए उसे छोड़ दें। लेकिन कुछ तो करें। निश्चित रूप से यह काम सरकार को करना है। पता नहीं, पानी का मसला केवल सरकारी भाषणों के भी आगे उसकी प्राथमिकता में कब आएगा। लेकिन व्यक्तिगत तौर पर हम भी कुछ कर सकते हैं। चौबीसों घंटे पानी देने की बचकानी योजनाओं का विरोध कर सकते हैं, जिसकी कोशिश इन दिनों कुछ शहरों में प्राइवेट-पब्लिक पार्टनरशिप के तहत की जा रही है।
और चलते-चलते.. हमारे एक मित्र ने एक अपार्टमंेट में फ्लैट लिया। उस मित्र ने बिल्डर से कहा- जरा वाटर हार्वेस्टिंग तो करवा लीजिए। बिल्डर का जवाब था- वाटर हार्वेस्टिंग की क्या जरूरत? 15-20 फीट पर तो पानी है। अब हमारे वे मित्र उस दिन का इंतजार कर रहे हैं, जब वह पानी 150 से 200 फीट पर पहुंच जाएगा। आग लगे तब कुआं खोदे..आखिर यह राष्ट्रीय प्रवृत्ति यूं ही नहीं बनी है।








