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सिनेमाई पसंद और हमारा यथार्थ

प्रीतीश नंदी | Oct 25, 2012, 00:02AM IST
 
 


बीते शुक्रवार को करण जौहर की नई फिल्म 'स्टूडेंट ऑफ द ईयर' रिलीज हुई। वरुण धवन, सिद्धार्थ मल्होत्रा और आलिया भट्ट जैसे तीन नवोदित कलाकारों और सत्तर के दशक में आईं नाजिया हसन के नए अंदाज में पेश किए गए एक गाने के साथ यह उसी तरह का चमक-दमक से भरपूर फंतासी सिनेमा है, जिसके लिए करण जौहर मशहूर हैं। इस फिल्म ने पहले दिन ही भारतीय बॉक्स ऑफिस पर 10 करोड़ रुपए तक कमा लिए। इसके वीकेंड कलेक्शंस 30 करोड़ का आंकड़ा पार कर गए। 


बहरहाल, उसी शुक्रवार को मुझे मुंबई फिल्म समारोह के अंतर्गत आइनॉक्स थिएटर में एक छोटी फिल्म देखने का मौका मिला। यह फिल्म मुंबई के एक युवा वकील शाहिद आजमी का बायोपिक थी, जिसकी दो साल पहले दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।


शाहिद एक मानवाधिकार कार्यकर्ता था, जो गरीबों के लिए काम करता था और ज्यादातर ऐसे लोगों के मुकदमे लड़ता था, जिन्हें दूसरे वकील इस वजह से लडऩे से इनकार कर देते कि या तो वे उनकी फीस देने लायक नहीं होते या फिर इन मुकदमों को लडऩा राजनीतिक तौर पर असुविधाजनक या खतरनाक होता।


शाहिद के मुवक्किलों में ज्यादातर ऐसे मासूम लोग होते, जिन पर आतंकी साजिशों में लिप्त होने का इल्जाम होता। शाहिद ने अपने सात साल के संक्षिप्त कॅरिअर में ऐसे 17 आरोपियों को अदालत से बरी कराया। शाहिद उनकी व्यथा को समझता था, क्योंकि वह खुद भी इस तरह की परिस्थितियों से गुजर चुका था और उसे जेल में भी रहना पड़ा था।


मगर चूंकि शाहिद संदिग्ध आतंकियों (जिनमें से ज्यादातर बहुत गरीब परिवार से होते थे) के मुकदमे लड़ता था, लिहाजा जब उसकी हत्या हुई तो किसी ने उस पर एक आंसू नहीं बहाया। उसे ऐसे लोगों के बचावकर्ता के रूप में देखा जाता, जिनका कोई बचाव करना पसंद नहीं करता था। फिल्म का नाम था- 'शाहिद'।



यह जबर्दस्त फिल्म है, जिसे मुंबई की अनेक छोटी-बड़ी गलियों में फिल्माया गया है। इस फिल्म के निर्देशक हंसल मेहता ने दर्शकों की लोकप्रिय पसंद के नाम पर तनिक भी समझौता नहीं किया है। संक्षेप में कहें तो इसमें न तो कोई लोकप्रिय गाना है, न डांस है और न ही किसी तरह की कोई हीरोगिरी। इसका नायक शाहिद उतना ही असहाय है, जितना कि उसके मुवक्किल।


वह अपनी समझ के मुताबिक सत्य के पक्ष में खड़े होने के नतीजों को लेकर भी उतना ही डरा हुआ रहता है। (वह एक सांप्रदायिक दंगे में किसी तरह बच पाता है, उसे जान से मारने की धमकियां मिलती हैं और अदालतों के बाहर उस पर हमले भी होते हैं।) इसके बावजूद वह हम जैसे ज्यादातर लोगों की तरह ही सही या गलत की अपनी समझ के आधार पर आगे बढ़ता रहा।


वह उन लोगों से मुंह नहीं फेर सकता था, जो उसके पास मदद की गुहार लेकर आते थे। यह एक सीधी-सरल और दिल को छू लेने वाली कहानी है। जब मैं यह फिल्म देख रहा था, उस वक्त थिएटर में मेरे साथ 100 से भी कम लोग थे। जरा सोचिए कि यदि यह एक फेस्टिवल स्क्रीनिंग नहीं होती, तो इस फिल्म को कितने लोग देखते।



यह देखकर मेरे मन में सवाल उठा कि आखिर हम लोग नाच-गाने, कॉमेडी और एक्शन के तड़के से भरपूर खास तरह की फॉर्मूलाबद्ध फिल्में देखना क्यों पसंद करते हैं? हम अपने जीवन व आस-पास के माहौल को प्रतिबिंबित करने वाली दमदार कथ्यात्मक फिल्मों को नजरअंदाज क्यों कर देते हैं? नहीं, मैं आलोचनात्मक नहीं हो रहा हूं।


आप सबकी तरह मैं भी यही करता हूं। लेकिन हां, कभीकभार अच्छा सिनेमा भी देख लेता हूं। लोकप्रिय अभिरुचियों का अनादर करने की मेरी कोई मंशा नहीं है, लेकिन यह जरूर जानना चाहता हूं कि आखिर क्यों हम हमेशा हकीकत को दरकिनार कर देते हैं और सतही फैंटेसी के प्रलोभन की ओर उन्मुख हो जाते हैं? क्या इसीलिए हम कभी खतरनाक मुजरिमों और देश को लूटने वाले घोटालेबाजों को पकडऩे के लिए नहीं भागते और अपने द्वारा रची गई कल्पनाओं के झूले में झूलते रहते हैं? क्या इसीलिए शाहिद आजमी जैसों की हत्या हो जाती है और बड़े-बड़े घोटालेबाज पुलिस की सुरक्षा में अकड़कर घूमते रहते हैं?


शाहिद की बीवी ने एक बार उससे पूछा कि वह बार-बार जान से मारने की धमकी मिलने के बावजूद पुलिस के पास क्यों नहीं जाता। इस पर शाहिद का जवाब बिल्कुल सीधा था- 'वे आम लोगों के लिए कुछ नहीं करते। 'क्या हम सब इसी सच्चाई का सामना नहीं करते- एक ऐसे देश में आम नागरिक होने का अकेलापन व त्रासदी, जहां पर सिर्फ अमीर, रसूखदार और मशहूर लोग आसानी से हर तरह की चीजों के साथ बचकर निकल जाते हैं? धमकियां मिलने पर आम आदमी के लिए पुलिस स्टेशन आखिरी जगह होती है, जहां वह मदद मांगने जाता है।


आखिर क्यों हम दूसरों के दुख-दर्द में सहभागी बनने को तैयार नहीं हैं? क्यों हम उनकी विपदा देखने को तैयार नहीं हैं? क्यों हम इस तरह सच्चाई व हकीकत से किनारा करते हैं? क्यों हम ज्यादातर ऐसी फिल्में देखते हैं, जो कल्पनाओं के मनमोहक संसार के साथ हमारे समक्ष एक छलावा पेश करती हैं? इसकी बजाय हम ऐसी फिल्में क्यों नहीं देखते, जिनके साथ अपनी संवेदनाएं जोड़ सकें? यहां मुझसे ज्यादा अक्लमंद लोग होंगे, जो इस पलायनवादिता को स्पष्ट कर सकते हैं। मुझे तो यही लगता है कि हम जितने गरीब होते हैं, उतना ही कम हम अपने साथी लोगों के दुख-दर्द को साझा करना चाहते हैं। इसकी बजाय हम उस चमक-दमक और ग्लैमर को ताकते रहते हैं, जिसके पीछे अमीर अपनी जिंदगी के उबाऊ खालीपन को छिपाते हैं।


प्रीतीश नंदी



वरिष्ठ पत्रकार और फिल्मकार    

 
 
 

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