अच्छी लेकिन अधूरी प्रगति
बाल मृत्युदर के ताजा आंकड़े संतोषजनक तो नहीं हैं, मगर ये दर घटाने की दिशा में हुई प्रगति यह उम्मीद जरूर बंधाती है कि अगर सुनियोजित एवं सार्थक ढंग से प्रयास किए जाएं तो देर से ही सही, लेकिन तय लक्ष्यों को पाने में सफलता मिल सकती है।
सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) के आंकड़ों के मुताबिक 2011 में प्रति 1000 जीवित जन्मे बच्चों में पांच साल उम्र के भीतर मौत की दर 44 पर आ गई। जबकि उसके पिछले साल हर हजार जिंदा जन्मे बच्चों में 47 पांच साल उम्र पूरा करने के पहले काल कवलित हो गए थे।
हालांकि मार्च 2012 में पूरी हुई 11वीं पंचवर्षीय योजना में तय लक्ष्य पर ध्यान दें, तो यह प्रगति फीकी नजर आती है। उसके मुताबिक 2012 तक बाल मृत्युदर को 30 बच्चे प्रति हजार पर लाने का लक्ष्य था। चूंकि 11वीं योजना में यह लक्ष्य पूरा नहीं हुआ, इसलिए 12वीं पंचवर्षीय योजना में, यानी सन 2017 तक इस दर को 25 पर लाने के इरादे को पूरा करना और कठिन हो गया है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक भारत में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मौत के मुख्य कारण जन्म के दौरान होने वाली मृत्यु के अलावा निमोनिया, डायरिया और खसरा जैसी बीमारियां हैं। गर्भावस्था एवं प्रसव के दौरान जच्चा-बच्चा की बेहतर देखभाल और उसके बाद आम चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध करवाकर बड़ी संख्या में ऐसी मौतों को रोका जा सकता है, इस पर विशेषज्ञों में सहमति है।
अच्छी बात है कि सरकार ने आठ लाख मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (आसा) के जरिये नवजात बच्चों की देखभाल और हर जिला अस्पताल में शिशुओं के लिए विशेष खंड बनाने की शुरुआत की है। इसके अच्छे परिणाम बिहार, ओडिशा, उत्तर प्रदेश और सिक्किम जैसे राज्यों में भी देखने को मिले हैं, जहां बाल मृत्युदर में चार अंकों की गिरावट दर्ज की गई। बहरहाल मध्य प्रदेश, ओडिशा और उत्तर प्रदेश पर अभी भी सबसे ज्यादा ध्यान दिए जाने की जरूरत है, जहां ये दर सबसे ऊंची बनी हुई है। बाल मृत्यु रोकने के साथ ही कुपोषण दूर करने की रणनीति भी बनाई जानी चाहिए, ताकि बच्चे न सिर्फ जीवित रहें, बल्कि उन्हें संपूर्ण बचपन भी मिले।






