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प्रार्थना में कुछ मांगें या न मांगें पर दीन भाव बनाए रखें

पं. विजयशंकर मेहता | Jul 17, 2012, 00:32AM IST
 
 

भगवान और भक्त के बीच एक ऐसा रिश्ता होता है, जिसमें भगवान की ओर से लगातार कृपा बरसती रहती है। यदि भक्त की तरफ से भी प्रार्थना का सिलसिला जारी रहे तो फिर मिलन होकर रहता है। प्रार्थना में आप मांग बनाए रखें या न रखें, लेकिन दीन भाव जरूर बनाए रखें। दीन भाव एक तरह से प्रार्थना के प्राण हैं।

सुंदरकांड में हनुमानजी जब मां सीता से विदाई ले रहे थे, तब सीताजी ने अपनी और रामजी की स्थिति पर जो पंक्तियां कही थीं, वो भक्त और भगवान के रिश्तों पर प्रकाश डालती हैं। कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा।। दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी।। जानकीजी ने कहा - हे तात! मेरा प्रणाम निवेदन करना और इस प्रकार कहना - प्रभु! यद्यपि आप सब प्रकार से पूर्णकाम हैं (आपको किसी प्रकार की कामना नहीं है), तथापि दीन-दुखियों पर दया करना आपका विरद है और मैं दीन हूं, अत: उस विरद को याद करके नाथ! मेरे भारी संकट को दूर कीजिए।

यहां सीताजी ने एक शब्द प्रयोग किया है पूरनकामा। भगवान को भक्त से कोई कामना नहीं है। वे इस तरह कृपा बरसाते हैं, जैसे जलता हुआ दीया रोशनी। दीए को यह फिक्र नहीं होती कि रोशनी किसे दें या न दें। परमात्मा की कृपा भी इसी प्रकार बरसती है। साथ ही सीताजी ने हनुमानजी से कहा, मैं दीन हूं इसलिए आपका मेरा रिश्ता इस प्रकार रहेगा कि आपको मेरे संकट दूर करने होंगे। यह बात हनुमानजी से इसलिए कही गई कि हनुमानजी दूत बनकर आए थे। आज भी कोई संदेश हम उनके माध्यम से परमात्मा तक पहुंचा सकते हैं।
 
 
 

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