बंधक संकट पर राष्ट्रीय नीति
राहत की बात है कि आखिरकार केंद्र सरकार ने माओवादियों द्वारा अपहरण की घटनाओं के बारे में एक राष्ट्रीय नीति बनाने की कोशिश की है। वरना अब तक की दास्तां यही है कि जब कभी अपहरण की कोई बड़ी घटना होती है, तो खूब हो-हल्ला मचता है, लेकिन संकट दूर होने के बाद उसे भुला दिया जाता है।
बहरहाल, वैसे मौकों पर बंधकों के संकट के बारे में सारे देश के लिए समान नीति की आवश्यकता जरूर महसूस की जाती है, क्योंकि अलग-अलग राज्य सरकारें बंधक और गिरफ्तार नक्सलियों की अदला-बदली की मांग पर अलग-अलग नजरिया अपना लेती हैं।
अब केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राष्ट्रीय नीति का जो मसविदा तैयार किया है, उसमें कहा गया है कि किसी बंधक के बदले कट्टर नक्सलियों की रिहाई नहीं होनी चाहिए, बल्कि राज्य सरकारों को विशेष बलों का इस्तेमाल करते हुए कमांडो ऑपरेशन के जरिए बंधक को छुड़ाने की कोशिश करनी चाहिए। मसविदे के मुताबिक इस काम में राज्य चाहें तो राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड्स की मदद ले सकते हैं।
इसके अलावा राज्यों को सलाह दी गई है कि वे अपहर्ताओं से बातचीत के लिए विशेष प्रशिक्षित वार्ताकार तैयार करें और अपहरण की घटना के बाद स्थानीय मीडिया का इस्तेमाल करते हुए अपहर्ताओं के खिलाफ जनमत का दबाव बनाएं। हाल ही में देखा गया है कि माओवादियों ने आम लोगों, खासकर आदिवासियों का मानव ढाल के रूप में इस्तेमाल किया है।
गृह मंत्रालय के प्रारूप में सलाह दी गई है कि जहां ऐसा होने की आशंका हो, वहां सुरक्षा बलों को रबर की गोलियां और ऐसे हथियारों का इस्तेमाल करना चाहिए, जिससे लोगों की जान न जाए। स्पष्ट है, सरकार ने जनमत के महत्व को समझा है, जो निर्दोष लोगों के मारे जाने पर सुरक्षा बलों के खिलाफ हो जाता है। नक्सलवाद से निपटने की व्यापक रणनीति के संदर्भ में नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास शून्यता पैदा होने की बात स्वीकार करते हुए उसे दूर करने पर जोर दिया गया है।
कुल मिलाकर प्रस्तावित नीति में अनेक अच्छी बातें हैं। इसके बावजूद यह सवाल अपनी जगह कायम है कि आखिर इस पर कितना प्रभावी अमल हो सकेगा? आखिर समस्या सिर्फ नीति की नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति की कमी की भी होती है।






