कर्नाटक से कलुषित हुई राजनीति पर विलाप करने से कुछ नहीं होगा। यह तो महज एक झलक है। सत्ता भयावह, बेहया बना सकती है। तंदूर कांड इसका सबसे लोमहर्षक उदाहरण था। जो दृश्य आज दक्षिण भारत से डरा रहे हैं, वैसे उत्तर, मध्य और पश्चिम में भी लगातार बनते-बिगड़ते रहे हैं। पहले भी शर्मसार कर चुके हैं, आज भी सकते में डाल रहे हैं। और ऐसे ‘प्रसंगवश’ आक्रोश का सिलसिला यदि जारी रहा तो आगे भी हमारे सिर तो झुके ही रहेंगे। कलंकित नेता निश्चित ही अधिक समृद्ध होकर सत्ता के उजले महलों में दिखेंगे।
ऐसा तब तक होता रहेगा, जब तक हम ‘किसे चुन रहे हैं’ इस बारे में 100 प्रतिशत सतर्क नहीं हो जाते। चाहे महाराष्ट्र के मंत्री का एयरहोस्टेस के साथ अश्लील हरकत का मामला हो। या कि तत्कालीन केंद्रीय मंत्री के एक पर्यावरणविद् युवती के साथ शर्मनाक र्दुव्यवहार की घटना-सभी के बाद हमने एक मतदाता के रूप में क्या किया? या तो कलंकित नेताओं को फिर भी हमने ही चुन लिया। या फिर उन्हीं को दोबारा उम्मीदवार बनाकर, हमें सामूहिक मूर्ख बनाने की उम्मीद लगाने वाले राजनीतिक दलों को हमने सरकार बनाने का अवसर दे दिया।
बिहार में एक कलेक्टर ने जब कानून का राज स्थापित करने की कोशिश की तो स्वार्थी नेताओं की शह पर पाषाण युग जैसा बर्बर कृत्य सामने आया। पथराव कर-करके मार डाला। सिद्ध कुछ न हुआ अदालतों में। किंतु जनता की अदालत में इस पाप के परोक्ष भागीदारों को जीत का तोहफा मिला। उत्तर भारत में कोई 20 मंत्री शराब, हथियार और तस्करी के कभी कानूनन सिद्ध न किए जा सकने वाले गैर-कानूनी कारोबार चलाते-चलाते थक गए। किंतु हम उन्हें जिताते-जिताते नहीं थके। मध्यप्रदेश में तत्कालीन मुख्यमंत्री के करीबी और बगैर चुनाव लड़े मंत्री रहे, एक नेता ने अवैध शराब टैंकरों के धंधे में लगे लोगों को सरकारी ‘शांति समितियों’ का हिस्सा बनाया। तो बाद में मुख्यमंत्री के नाम पर पैनल बनाकर वे लोग चुनाव लड़े, शान से जीते। हमने ही जिताया।
ओड़िशा, असम और उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य हों, या गुजरात जैसे विशाल, खुशहाल राज्य; अवैध फायदे, आपराधिक गठजोड़ और फर्जी मुठभेड़ों के किस्सों से अटे पड़े हैं। गृह मंत्रालयों, पुलिस मुख्यालयों के गलियारे। सभी बदनाम। सभी नामचीन। सभी भरोसे को तोड़ने वाले। सभी हमारे पास चुनाव के समय लौटकर आने वाले। सभी हमारे भरोसे के विरुद्ध हमीं से, वोट पाकर, हमीं पर काबिज होने वाले। क्या कांग्रेस, क्या भाजपा, क्या कम्युनिस्ट, क्या दूसरा, तीसरा, चौथा मोर्चा-सभी शामिल, सभी काबिज।
भ्रष्टाचार के विरुद्ध तो राष्ट्र एकजुट है। हम सभी जागरूक हैं। हो गए हैं। रहेंगे। लेकिन अब नेतृत्व के नैतिक और चारित्रिक पतन के विरुद्ध युद्ध शुरू करना है। कर्नाटक और आंध्र से उपजे शर्म के सैलाब को अब वोटिंग मशीनों के माध्यम से कुचलना होगा। भ्रष्टाचार से कहीं अधिक बड़ा नासूर है चारित्रिक पतन। वो भी सत्ताधीशों का। इसलिए हमारे महान देश की सभ्यता को सहेजने के लिए हम सभी नागरिकों को इस कलंक के बहाने, सुनहरा अवसर मिला है। सार्वजनिक जीवन में चाहे नेता हों, अफसर हो, न्यायाधीश हों या कि हो मीडिया-नैतिक मूल्यों के महत्व को दृढ़ता से स्थापित करने का अवसर। हर मोड़ पर।
यूं भी, दुनिया में नेतृत्व पहले सैन्य बलों से स्थापित किया जाता था। फिर राजनीतिक बलबूते पर। पिछले पच्चीस बरस से आर्थिक ताकत से चल रही है दुनिया। भारत को वैल्यू सिस्टम ही वर्ल्ड लीडर बनाएगा। इसलिए भी दुनिया में ऐसा आधार सिर्फ हमारे पास है।