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बंटवारे के दिनों की याद

 
Source: खुशवंत सिंह   |   Last Updated 00:16(21/01/12)
 
 
 
 
उन्नीस सौ सैंतालीस का साल आज भी याद आता है। उस साल अगस्त के पहले हफ्ते के अंत में मैंने लाहौर को अलविदा कह दिया था। मैं लॉरेंस गार्डन के समीप एक संभ्रांत रिहायशी इलाके में रहता था। सही समय पर वहां से निकल जाने वाला मैं आखिरी सिख था। मैं रात की गाड़ी पकड़कर कालका पहुंचा और फिर वहां से एक टैक्सी लेकर कसौली चला गया, जहां मेरा परिवार रहता था। मुझे पता नहीं था कि मेरा भविष्य क्या होगा। फिर मैंने सोचा कि चलो दिल्ली चलकर अपनी किस्मत आजमाते हैं।

शिवालिक पर्वत श्रंखला से राजधानी तक उस २क्क् मील की ड्राइव को मैं कभी भुला नहीं सकता। रास्ते में एक भी इंसान नजर नहीं आ रहा था। सभी गांव वीरान और उजाड़ लग रहे थे। न कहीं कोई बसें थीं, न कारें, न साइकिलें और न ही राहगीर। लेकिन शायद दिल्ली से 30 मील पहले मैंने सड़क के बीचोंबीच एक जीप खड़ी देखी।

मैंने देखा कि जीप में कुछ सिख सवार थे। मैं उनकी तरफ गया। उन सभी के कंधे पर राइफलें टंगी हुई थीं। उनमें से एक ने मुझे देखते ही कहा : ‘सब सफाया कर दित्ता’ यानी हमने सबको साफ कर दिया। मैं समझ गया कि वह क्या कहना चाहता था। दहशत के मारे मेरी रीढ़ में सिहरन दौड़ गई। जैसे-तैसे मैं नई दिल्ली में अपने पिता के घर पहुंचा। राजधानी में बड़े पैमाने पर उथल-पुथल मची हुई थी और अराजकता की स्थिति थी।

शहर के मुस्लिम हजारों की तादाद में पुराने किले में जमा हुए थे और पाकिस्तान जाने वाली रेलगाड़ियों का इंतजार कर रहे थे। दो दिन बाद मैं अपनी साली के साथ बाहर घूम रहा था और हम चहलकदमी करते हुए संसद भवन तक चले आए। वहां बड़े पैमाने पर लोग मौजूद थे और ‘महात्मा गांधी की जय’, ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे लगा रहे थे। फिर सब तरफ खामोशी छा गई। थोड़ी देर बाद लाउड स्पीकर पर सुचेता कृपलानी की आवाज सुनाई दी। उन्होंने ‘वंदे मातरम’ गाया। इसके बाद पं. जवाहरलाल नेहरू के प्रसिद्ध भाषण ‘नियति से भेंट’ का प्रसारण किया गया।

पेंगुइन वाइकिंग द्वारा प्रकाशित नयनतारा पोठेन की किताब ‘न्यू देहली इन लव एंड वॉर : ग्लिटरिंग डेकेड्स’ पढ़ते समय मुझे ये तमाम बातें फिर याद हो आईं। उन्होंने अपनी इस किताब में स्वतंत्रता से पहले देश में आए बदलावों को दर्ज किया है। यह किताब ‘केवल गोरों के लिए’ क्लब में शामिल होने से इनकार कर देने वाले नई पीढ़ी के अंग्रेजों के बारे में बताती है, जो भारतीयों से दोस्ती करना चाहते थे। भारतीय भी अंग्रेजों से पहले की तरह नफरत नहीं करते थे। वास्तव में अमेरिकियों की तुलना में अंग्रेज उनके कहीं प्रिय बन गए थे।

पोठेन ने सिडनी यूनिवर्सिटी से पीएचडी की है। उन्होंने स्वतंत्रता के पूर्व और उसके बाद के दो दशकों की प्रासंगिक सूचनाएं एकत्र करते हुए एक सराहनीय कार्य किया है। मैं उनकी किताब के दूसरे हिस्से के बारे में तो खैर कुछ कहने को सक्षम नहीं हूं, क्योंकि उस दौरान मैं विदेश में था और तब के भारतीय समाज के बारे में मुझे अधिक नहीं मालूम है। बहरहाल, देश के इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए नयनतारा पोठेन की यह किताब बहुत विचारोत्तेजक और पठनीय दस्तावेज है।
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अलग-अलग नजरिया :

मैं यह देखकर हैरान रह जाता हूं कि भारतीय और अंग्रेज कवि प्रकृति के संबंध में किस तरह अलग-अलग रवैया अख्तियार करते हैं। भारतीय कवियों के लिए प्रकृति की सबसे लुभावनी चीज होती है बारिश। गर्मी की तपिश के बाद जब क्षितिज पर काले-घनेरे बादलों का डेरा जम जाता है और फिर जब वे बरसने लगते हैं तो भारतीय कवियों की कलम से कविताएं भी बरसने लगती हैं। गड़गड़ाहट के साथ बारिश होती है और बिजली चमकने लगती है। तेज हवा दरख्तों को जड़ से उखाड़ फेंकती है। लोग बारिश में भीगने के लिए घर से बाहर निकल आते हैं।

सावन के झूले सज जाते हैं। जंगल में मोर थिरकने लगते हैं। ये तमाम प्रसंग भारतीय कवियों की कविता में बार-बार आते हैं। इसकी तुलना में वसंत उन्हें इतना नहीं लुभाता, क्योंकि इसी मौसम से गर्मी के कष्टसाध्य दिनों की शुरुआत होती है। लेकिन अगर अंग्रेजी के कवियों की कविताएं पढ़ें तो हम पाएंगे कि मार्च और अप्रैल के महीनों का वे बड़ा मोहक चित्रण करते हैं। अंग्रेजों के लिए बारिश एक व्यवधान है, जबिक खिली हुई धूप किसी दुर्लभ वरदान से कम नहीं। भारतीय कविता उत्सवप्रधान है, जबकि अंग्रेजी कविता विवरणप्रधान है।

संभव है मेरे ये तमाम निष्कर्ष गलत हों, क्योंकि मैं जिस कविता के संदर्भ में ये बातें कर रहा हूं, उसमें बारिश, धूप, फूल, मोर कुछ नहीं हैं, बल्कि वह अंधेरे के बारे में बात करती है। मैं अंग्रेजी के कवि थॉमस ग्रे की कविता ‘एलीजी रिटन इन कंट्री चर्चयार्ड’ की बात कर रहा हूं।

यह कविता पंजाब यूनिवर्सिटी के स्नातक पाठच्यक्रम में सम्मिलित की गई थी। मैंने इसे लगभग पूरी तरह याद कर लिया था और आज भी यह मुझे उद्वेलित कर देती है। यह कविता पढ़ने के बाद मैंने मन ही मन तय कर लिया था कि मैं उस जगह जाऊंगा, जहां यह कविता लिखी गई थी और मैंने ऐसा ही किया।

इंग्लैंड में क्रिसमस की अपनी पहली छुट्टियों के दौरान मैं हैम्पशायर काउंटी के जरेडस में एक होस्टल में रहने गया था। मुझे पता चला कि थॉमस ग्रे की कविता का चर्चयार्ड यहां से कुछ ही मिनट के फासले पर है। एक शाम मैं वहां चला गया। वह एक छोटा, उजाड़-सा गिरजाघर था, जिसके इर्द-गिर्द कब्रस्तान था। मैं एक कब्र के सामने बैठ गया, आंखें बंद कर लीं और वह सब अनुभव करने का प्रयास करने लगा, जो ग्रे ने लिखा है। मैं उनकी लंबी कविता से चार पंक्तियां यहां प्रस्तुत कर रहा हूं : नजरों से ओझल हो जाता है वह भूदृश्य, जो कभी चमकीला और उजला था। हवा में टंगा रहता है स्थिरता का साम्राज्य।

खेतिहर किसान चलते चले जाते हैं अपनी लीक पर, पीछे छोड़ जाते हैं अंधेरा और निश्चलता, मेरे लिए, हम सभी के लिए। -लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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