पिछले हफ्ते मैककिन्से के पूर्व सीईओ और अमेरिका के सबसे हाई प्रोफाइल कापरेरेट व्यक्तित्वों में से एक रजत गुप्ता को इनसाइडर ट्रेडिंग संबंधी आरोपों के चलते गिरफ्तार कर लिया गया था। सात अरब डॉलर का हेज फंड चलाने वाले राजारत्नम् को पहले ही इनसाइडर ट्रेडिंग के लिए ११ वर्षो की सजा सुनाई जा चुकी है। तेरह अन्य लोग भी दंडित हुए हैं।
यह खबर कई उन लोगों को आश्चर्यजनक लग सकती है, जो अमेरिका को अनवरत लोभ, भौतिकवाद और उपभोक्तावाद के प्रतीक की तरह देखते हैं। जब हम बड़े हो रहे थे तो हमें अक्सर बताया जाता था कि ‘पाश्चात्य मूल्य’ समाज के लिए घातक हैं। हम भारतीय अधिक मानवीय, प्रेमपूर्ण, आध्यात्मिक और वास्तविक माने जाते थे। बाजारवाद से लेकर पारिवारिक मूल्यों में विघटन तक पश्चिम सभी गलत चीजों का प्रतिनिधित्व करता था। पश्चिम की तुलना में हम ‘गुड वन’ (या कहना चाहिए ‘जी वन’) माने जाते थे।
और इसके बावजूद यह अमेरिका ही है, जो दूसरों के विश्वास को ठेस पहुंचाने वाले व्यक्तियों को कड़ी से कड़ी सजा सुनाता है। चाहे इनसाइडर ट्रेडिंग हो या भ्रष्टाचार, अनुचित तरीकों से पैसा बनाने के लिए अमेरिका में कठोर सजा है। अगर रजत गुप्ता के केस को देखें तो पाएंगे कि शायद उन्हें इनसाइडर ट्रेडिंग से प्रत्यक्ष लाभ भी न पहुंचा हो। उन्होंने केवल अपने मित्र राजारत्नम् तक कुछ सूचनाएं पहुंचाई हों, यह जाने बिना कि उन सूचनाओं का क्या उपयोग होगा। लेकिन यदि यह सिद्ध हो जाता है तो अमेरिकी तंत्र में उन्हें दंडित करने के लिए यह पर्याप्त कारण होगा। हां, अमेरिका भौतिकवादी है। वह एक हद तक लोभी भी है।
इसके बावजूद उन्होंने एक ऐसा तंत्र रचा है, जिसमें मेहनत, नवोन्मेष, प्रतिभा और उद्यम से पैसा कमाया जा सकता है। जो लोग इन गुणों का प्रदर्शन करते हैं, वे अपने आप आगे बढ़ जाते हैं। अमेरिका की हर पीढ़ी ने सरकारी मदद के बिना अनेक इनोवेटर्स और अरबों डॉलर की ग्लोबल कापरेरेशनों को जन्म दिया है।
अमेरिकियों में दर्जनों खामियां हो सकती हैं, लेकिन वे अपने सिस्टम को लेकर बहुत सचेत और संरक्षणवादी हैं। जो भी अनुचित तरीकों से उनके सिस्टम को तोड़कर आगे बढ़ने का प्रयास करता है, उसे कड़ी सजा दी जाती है। दोषी चाहे कितना ही हाई प्रोफाइल क्यों न हो, अमेरिकी समाज उसे सबक सिखाने में कोई कसर नहीं बाकी रखता।
दूसरी तरफ हमारे यहां इनसाइडर ट्रेडिंग तो छोड़ दीजिए, भ्रष्टाचार के बड़े से बड़े आरोपी को भी उचित सजा नहीं मिलती। हमारे यहां तो कई लोग इनसाइडर ट्रेडिंग को भी गलत नहीं मानेंगे। वे उसे प्रभाव की स्थिति में होने का एक विशेषाधिकार समझेंगे। दलाल स्ट्रीट का कोई भी अनुभवी व्यक्ति आपको बता देगा कि सेबी के प्रशंसनीय प्रयासों के बावजूद इनसाइडर ट्रेडिंग जोरों पर चल रही है। इनसाइडर ट्रेडिंग केवल स्टॉक मार्केट तक ही सीमित नहीं है।
सरकार के जोनिंग मास्टर प्लान की सूचनाओं में सेंध लगाकर रियल एस्टेट खरीदने वाले डेवलपर्स भी इनसाइडर ट्रेडिंग करते हैं। लेकिन वे कभी दंडित नहीं होते। उल्टे यह होता है कि खुद हमारे द्वारा चुनी गई सरकार भ्रष्टाचार के विरुद्ध अभियान छेड़ने वाले लोगों के खिलाफ मोर्चा खोल लेती है। ऐसा लगता है जैसे भ्रष्टों की रक्षा करना ही सरकार की जिम्मेदारी हो।
हमारे प्रधानमंत्री के कार्यकाल में इतने बड़े पैमाने पर घोटालों का खुलासा हुआ, लेकिन इसके बावजूद वे लचर सफाइयां देते रहे (अमेरिका में रजत गुप्ता ने भी सफाइयां दी थीं, लेकिन उनकी एक न सुनी गई)। दुख की बात है कि हमारे विपक्षी दलों में भी भ्रष्टों की भरमार है। यानी अगर हम चाहें तो भी ईमानदार व्यक्तियों को निर्वाचित नहीं कर सकते।
आखिर गड़बड़ कहां हुई है? क्या हम पश्चिम की तुलना में अधिक भले और नेक नहीं थे? फिर क्या कारण है कि न्याय, समानता और सच्चाई के क्षेत्र में लोभी और भौतिकवादी पश्चिम हमसे बेहतर प्रदर्शन कर रहा है? वह न केवल हमसे अधिक समृद्ध है, बल्कि कई मोर्चो पर हमसे आगे भी मालूम होता है। इस कुरूप सच का सामना करना दुखद हो सकता है। हमारे यहां तो यही माना जाता है कि गरीब ही नेक आदमी होगा। कम से कम हमारी फिल्में तो यही दिखाती हैं।
वास्तव में हमारे पास अच्छे नेता इसलिए नहीं हैं, क्योंकि हमने कभी उन्हें चुनने की परवाह नहीं की। हमने हमेशा ऐसे नेताओं को चाहा, जो हमारी जाति और धर्म के हों। हमने ईमानदारी से ज्यादा महत्व वंशावली को दिया। हमारे यहां संपदा उत्पन्न करने के लिए एक गुणतंत्र नहीं है। पश्चिम के पास है, इसलिए वह आज हमसे ज्यादा समृद्ध और कुछ मायनों में हमसे अधिक नेक है। चंद सामंतों और अनेक सामान्यजनों का हमारा मौजूदा तंत्र संपदा उत्पन्न नहीं कर सकता।
वह इनोवेशन को हतोत्साहित करता है और रसूखदारों के हाथों में संसाधनों की चाबियां सौंप देता है। इस तरह तो हम लिपिकों का देश बनकर रह जाएंगे। जबकि आने वाला कल इनोवेटर्स का है।
क्या हम इस स्थिति को बदल सकते हैं? यकीनन। धीरे-धीरे ही सही, लेकिन समाज जरूर बदलता है। एक समय था, जब हमारे यहां सती प्रथा जैसी कुरीतियां थीं। हमने समझ लिया कि यह एक गलत परंपरा है और धीरे-धीरे वह खत्म हो गई। बहुत पुरानी बात नहीं है, जब जर्मनी ने नाजीवाद के तहत बड़े पैमाने पर यहूदियों का कत्ल किया था। आज ऐसी किसी घटना की कल्पना करना भी संभव नहीं है।
लेकिन बदलाव तभी संभव है, जब हम पहले यह स्वीकारें कि हमें बदलाव की जरूरत है। हमें जरा आत्ममंथन की दरकार है। एक भ्रष्ट तंत्र में रहते-रहते हम भी भ्रष्टाचार के अभ्यस्त हो गए हैं। असाइनमेंट्स की नकल करने से लेकर रेलवे टिकटों के लिए अपने बच्चों की गलत उम्र बताने तक हम सभी ने कभी न कभी कुछ गलत किया है और अब वह हमारे जीवन का अंग बन गया है।
हमें अपने लिए एक नई मूल्य प्रणाली रचनी होगी। हमें लोकपाल बिल जैसी सकारात्मक पहल का स्वागत करना चाहिए। हम सभी को संसद के शीतकालीन सत्र को ‘लोकपाल सत्र’ कहकर बुलाना चाहिए, ताकि हमारे शासकों को याद रहे कि उनका क्या फर्ज है।