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सलमान की बातों का सच

टोनी जोसेफ | Jul 16, 2012, 00:00AM IST
 
 

‘सिल्वर ब्लेज’ यानी एक गुमशुदा घोड़े की गुत्थी सुलझाने में शरलॉक होम्स को जिस अहम सवाल से मदद मिली, वह यह था कि ‘आखिर कुत्ता भौंका क्यों नहीं?’ इसका जवाब जाहिर तौर पर यह था कि कुत्ता इसलिए नहीं भौंका, क्योंकि घोड़ा चुराने वाला ट्रेनर ही था।

यदि शरलॉक होम्स आज वरिष्ठ कांग्रेस नेता और केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद द्वारा अपनी पार्टी की दशा-दिशा के बारे में दिए गए बेबाक बयानों पर गौर करते, तो वे शायद यही पूछते - ‘आखिर मंत्री महोदय किसी आम कांग्रेसी की तरह चुप क्यों नहीं रहे? उन्होंने पार्टी नेतृत्व पर क्यों हमला बोला, जबकि वे जानते थे यह राजनीतिक रूप से आत्मघाती हो सकता है?’
सलमान के हमले कितने गंभीर थे, उसकी एक बानगी यहां पेश है :


कांग्रेस द्वारा एक नई विचारधारा अपनाने की जरूरत के बारे में उन्होंने कहा, ‘हमें समकालीन चुनौतियों से निपटने के लिए नई विचारधारा अपनानी होगी। नब्बे के दशक में अपनाए गए सुधार नई सोच का आगाज थे, लेकिन आज हमें आगे बढ़ने के लिए अपनी नई पीढ़ी के नेता राहुल गांधी से नई सोच की जरूरत है। हमें साफ करना होगा कि अगले आम चुनाव में हम किस मुद्दे के साथ आगे बढ़ना चाहते हैं।’


राहुल के नेतृत्व के बारे में उनका कहना था, ‘अब तक हमने उनके विचारों और योजनाओं की मामूली झलक ही देखी है, जैसे कि युवा कांग्रेस के चुनावों का लोकतंत्रीकरण। लेकिन उन्होंने इन सबको एक बड़ी घोषणा के रूप में नहीं गूंथा है। हम सबको उसका इंतजार है।’


सोनिया गांधी को क्या करना चाहिए, इस बारे में उनकी राय थी, ‘यूपीए-2 में प्रशासन और राजनीति का घालमेल हो गया है। बिखरे हुए हालात हैं। हमें नए सिरे से बिसात बिछानी होगी और यह सिर्फ कांग्रेस अध्यक्ष ही कर सकती हैं। प्रधानमंत्री सिर्फ सरकार चला सकते हैं।’


सरकार की नाकामी के बारे में उनका कहना था, ‘आर्थिक सुधारों की रफ्तार ही सुस्त नहीं पड़ी है, राजनीतिक व प्रशासनिक सुधार भी थम गए हैं।’
शरलॉक होम्स नुमा यह सवाल कि आखिर उत्तर प्रदेश के इस नेता ने यह आत्मघाती कदम क्यों उठाया, का जवाब यह है कि उनके पास खोने के लिए ज्यादा कुछ नहीं था। राजनीतिक शब्दावली में कहें तो वे यूं भी फिसलन की कगार पर थे। इस साल मार्च में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के मुकाबले कांग्रेस की करारी पराजय के बाद से ही इसके लिए काफी हद तक सलमान खुर्शीद को जिम्मेदार ठहराया जा रहा था। हालांकि इन चुनावों में कांग्रेस के मुख्य प्रचारक खुद पार्टी महासचिव राहुल गांधी थे।


सलमान पर मुख्य आरोप यह था कि ओबीसी कोटे में से मुस्लिमों के लिए नौ फीसदी आरक्षण का वादा करके और इस मसले पर चुनाव आयोग से टकराव मोल लेकर उन्होंने चुनावी माहौल को सांप्रदायिक बना दिया, जिसमें राहुल गांधी का प्रदेश को विकास और समृद्धि की राह पर ले जाने का संदेश दबकर रह गया और भयभीत मुस्लिम अपने स्थानीय ताकतवर रहनुमा मुलायम सिंह के पाले में चले गए। यहां तक कि खुद सलमान की पत्नी लुइस खुर्शीद फरूखाबाद सीट पर बुरी तरह हार गईं। ऐसे में एक ऐसी पार्टी, जो यह सुनिश्चित करने के लिए बेकरार हो कि उत्तर प्रदेश की नाकामी उनके प्रधानमंत्री पद के भावी उम्मीदवार राहुल गांधी के नाम पर बट्टा न लगाए, के लिए सलमान खुर्शीद आसानी से एक ऐसी खूंटी बन गए, जिस पर वह अपने तमाम गंदे कपड़े टांग सकती थी।


और आरोपों के गोले बहुत तेजी से बरसे भी। कांग्रेस की मुखिया सोनिया गांधी ने उत्तर प्रदेश में चुनावी नाकामी के कारणों का विश्लेषण करते हुए 7 मार्च को कहा था, ‘हमारी समस्या है.. बहुत सारे नेताओं का होना’। एके एंटनी कमेटी रिपोर्ट, जिसने हार के कारणों की और गहराई से पड़ताल की थी, भी दो माह बाद इसी नतीजे पर पहुंची : जरूरत से ज्यादा नेताओं का होना। किसी को भी कोई शक नहीं था कि कांग्रेस में कौन-सा नेता ऐसा था, जो ‘जरूरत से ज्यादा’
था!

3 मई को प्रेस से भेंटवार्ता में जब किसी ने सलमान से पूछा कि क्या उत्तर प्रदेश की करारी हार के बाद उन्होंने उसकी जवाबदारी ली, तो उन्होंने जवाब दिया : ‘निश्चित ही, हम जवाबदारी लेते हैं।’ और फिर उन्होंने शांत किंतु उपहासपूर्ण हंसी के साथ कहा, ‘मुझे खुशी होती यदि आप मुझसे पूछते कि क्या मैं (तीन साल पहले) लोकसभा चुनावों के दौरान हमारे द्वारा जीती गई 22 सीटों के लिए जिम्मेदार था, लेकिन आपने मुझसे कभी यह नहीं पूछा.. फिर आप आज मुझसे यह सवाल क्यों पूछ रहे हैं?’


इसे सलमान के नजरिये से देखें और इसमें छिपे दोहरे फरेब को भांपने की कोशिश करें। उत्तर प्रदेश में राहुल की नाकामी के लिए न केवल उन्हें जिम्मेदार ठहराया गया, बल्कि पार्टी में उन पर एक ऐसे व्यक्ति का ठप्पा भी लगा दिया गया, जिसने वर्ष 2014 के आम चुनावों के लिए प्रधानमंत्री पद के एक लोकप्रिय उम्मीदवार के रूप में राहुल गांधी के श्रेष्ठ अवसरों को भी नष्ट कर दिया। जिस व्यक्ति ने राहुल के अवसरों को नष्ट किया हो, निश्चित ही भविष्य में उसके अवसर उजले नहीं हो सकते। यह 59 वर्ष के किसी स्पष्टवादी और महत्वाकांक्षी राजनेता के लिए अच्छी स्थिति नहीं कही जा सकती, जिसके पास भारतीय राजनीति के मानकों के अनुसार सक्रिय राजनीति के पूरे तीन दशक और हों।


जब हम इस पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर बात करते हैं तो सलमान का मूल संदेश हमारे सामने साफ हो जाता है। कांग्रेस उत्तर प्रदेश में केवल इसीलिए बुरी तरह नहीं हारी, क्योंकि उनके जैसे कुछ नेताओं ने यहां-वहां नासमझीभरे बयान दिए थे, वह इसलिए हारी, क्योंकि वह और बड़ी समस्याओं से जूझ रही थी। उसके पास कोई विचारधारा नहीं थी, कोई नेता नहीं था, और वह राजनीति और प्रशासन में फर्क नहीं कर पा रही थी। सलमान ने जिस तरह दम के साथ सार्वजनिक रूप से अपनी बात कही, उससे यह तो तय हो गया है कि कांग्रेस अब उत्तर प्रदेश में हुई किरकिरी के लिए उन्हें दोषी ठहराने के बजाय वास्तविक उत्तरों की खोज शुरू करेगी। वास्तव में यदि वे सभी को कंविंस कर दें कि वे पार्टी मुख्यालय पर हमला बोलने के बजाय राहुल को जल्द से जल्द पार्टी का नेता बनाने पर जोर दे रहे थे तो वे कांग्रेस में राहुल की नई टीम के सदस्य भी बन सकते हैं।

और ठीक इसी बिंदु पर हमारे सामने एक अंतिम सवाल उठ खड़ा होता है : क्या सलमान जो कह रहे हैं, वह सच है? क्या कांग्रेस के सामने विचारधारा, नेतृत्व और प्रशासन का संकट है? यकीनन है, हालांकि मैं इस फेहरिस्त में भ्रष्टाचार पर लचर रवैया, खराब कार्यकारी कौशल और ऊर्जाहीनता को भी जोड़ना चाहूंगा। लेकिन यह तो खैर कोई नई खबर नहीं है, इस पर अपना वक्त क्यों बरबाद करना?


लेखक बिजनेसवर्ल्ड के पूर्व संपादक और मीडिया सर्विस फर्म के चेयरमैन हैं।
 
 
 

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