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रोशनी के नगीने की उपासना

खुशवंत सिंह | Aug 04, 2012, 01:43AM IST
 
 

सूर्योदय का नजारा काफी हसीन होता है, जिसे देखकर हमें काफी सुकून मिलता है। सूरज को उगते हुए देखना वास्तव में बहुत शानदार अनुभव होता है। यह प्रभात की वह बेला होती है, जब आकाश में लालिमा छा जाती है और भोर का तारा अपनी पूरी आभा के साथ दमक रहा होता है। हम रोज उगते हुए सूरज का दीदार करते हैं, फिर भी हमारा इससे मन नहीं भरता। हमारे यहां उगते हुए सूरज की आराधना करने की भी परंपरा है।

ऐसा करते हुए हम संभवत: अपने खुशहाल जीवन में एक नई सुहानी सुबह देने के लिए उस ईश्वरीय शक्ति के प्रति आभार प्रकट करते हैं। दुनिया की तमाम भाषाओं के साहित्य में उगते हुए सूरज के बारे में कुछ न कुछ लिखा गया है। इस संदर्भ में मुझे उमर खैयाम की एक फारसी रुबाई याद आ रही है, जिसमें सूर्याेदय की बेला का बहुत खूबसूरत जिक्र है। यह रुबाई कुछ इस तरह है :-

उठो-जागो,
रोशनी के उस बेमिसाल नगीने के दीदार के लिए,
जिसने भोर के तारे को दी है,
एक नई परवाज।
और देखो, पूरब से आए इस बहेलिए ने
फांस लिया है सुल्तान के कंगूरों को
अपनी जगमग किरणों के फंदे में।
जब सुहानी भोर की बायीं भुजा,
ठहरी हुई थी आसमान में।
तभी मैंने मयखाने में सुना,
किसी का क्रंदन।
उठो-जागो, मेरे दुलारो
और भर लो अपना प्याला।
इससे पहले कि सूख जाए
जीवन की मदिरा
उसके प्याले से।

गायत्री महामंत्र को भी कुछ लोग सूर्य की उपासना से जोड़ते हैं। यह यजुर्वेद के मंत्र ‘ú भूभरुव: स्व:’ और ऋग्वेद के छंद ३.६२.१क् के मेल से बना है। सूर्योदय व सूर्यास्त के समय इसका पाठ किया जाता है।

ओम भूभरुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं।
भर्गो देवस्य धीमहि धियो योन: प्रचोदयात।

इसका भावार्थ है- ‘उस प्राणस्वरूप, दु:खनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अंत:करण में धारण करें और वह हमें सन्मार्ग की ओर ले जाए।’

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सांप की केंचुली :
पिछले कॉलम में मैंने आदिल जस्सावाला और उनकी एक कविता का जिक्र किया था। आज मुझे उनके कविता संग्रह ‘ट्राइंग टू से गुडबॉय’ में वर्णित एक और कविता याद आती है, जिसका शीर्षक उन्होंने ‘सांप की केंचुली’ दिया है। कविता कुछ इस तरह है:-

जंगल में विचरते हुए, एक जगह ठहर गई मेरी नजर,
एक लंबा-सा मोजा लटक रहा था कंटीली झाड़ियों पर।
यह कुछ-कुछ लगता था आस्तीन-सा,
पर इसकी बांह कहां गई, यह प्रश्न था महीन-सा।
मैंने न तो पहले देखा था सांप और न इसकी खाल।
जबकि मैं जंगल में रहा था कई साल।

आज चालीस साल बाद जंगल भी हो चुके हैं बर्बाद।
मेरी नजर भी नहीं रही अब पहले जैसी।
हालांकि अब मैं जितना भी देख सकता हूं,
उसमें कुछ नया देखने का करता हूं प्रयास।
संभवत: किसी और की ‘खाल’!
थोड़ी देर के लिए आया कुछ ऐसा ख्याल।
आखिर छंट गया मन से तमाम धुंधलका।
और यह हो गया महिला की पदचाप जैसा हल्का।

............................

संता-बंता की ‘दीवार’ :
सत्तर के दशक में यशराज बैनर की एक फिल्म आई थी- ‘दीवार’, जिसके एक दृश्य में सन्मार्ग और गलत राह पर चलने वाले दो भाइयों (शशि कपूर व अमिताभ बच्चन) के बीच तर्क-वितर्क का एक जबरदस्त दृश्य था। इस दृश्य में अमिताभ कहते हैं, ‘मेरे पास कार है, बंगला है, बैंक बैलेंस है। तुम्हारे पास क्या है?’ और शशि कपूर जवाब देते हैं, ‘मेरे पास मां है।’ अगर यही दृश्य संता-बंता के बीच फिल्माया जाता, तो कुछ इस तरह होता।

संता : मेरे कोल घर है, कार है, बैंक बैलेंस है। तेरे कोल की है?
बंता : मेरे कोल वी घर है, कार है, बैंक बैलेंस है।
संता : ओ तेरी! फिर साड्डी मां किदे कोल है?
(सौजन्य : अमरिंदर बजाज, दिल्ली)

............................

सबसे पुराना पासवर्ड :
आप जानते हैं दुनिया का सबसे पुराना पासवर्ड क्या है?
‘खुल जा सिम-सिम’।
(सौजन्य : मदन गुप्ता, चंडीगढ़)


लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।
 
 
 

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