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सत्संग से चोर बन गया सदाचारी

Bhaskar News | Dec 11, 2012, 05:40AM IST
 
 

एक  साधु किसी बस्ती के किनारे अपनी कुटिया में रहता था। सुबह-शाम उसकी कुटिया के आंगन में भजन-कीर्तन होता। उसके बाद वह सभी को उपदेश देता था। अपने उपदेशों के माध्यम से वह सदाचरण की शिक्षा देता था।
 
अमीर हो या गरीब, साधु की कुटिया के द्वार सभी के लिए खुले थे। लोग साधु के पवित्र जीवन से प्रभावित होकर बड़ी संख्या में वहां आते थे। एक दिन एक सेठ ने साधु के कीर्तन-प्रवचन में हिस्सा लिया। वह सेठ अति धनवान था। शहर में उसकी किराने की बहुत बड़ी दुकान थी।
 
सेठ ने कीर्तन के बाद साधु के ये उपदेश भी सुने - ‘धर्म व्रत-उपवास, ध्यान या लंबी पूजा-पाठ में नहीं, बल्कि जीवन के हर एक काम में सच्चई व ईमानदारी बरतना है। अंत समय में आदमी के साथ उसके भले-बुरे कर्म ही जाते हैं।’ सेठ साधु के प्रवचन बड़े भक्ति-भाव से सुन रहा था और मग्न होकर सिर हिला रहा था। उससे कुछ ही दूरी पर एक चोर बैठा था, जिसकी आंखें सेठ को लूटने के लिए उसी पर लगी थीं, किंतु साधु के प्रवचन सुनकर चोर इतना प्रभावित हुआ कि उसने सभी के जाने के बाद साधु के समक्ष चोरी छोड़ने का संकल्प लिया।
 
संयोग से अगले दिन वह उसी सेठ की दुकान पर कुछ सामान लेने गया। उसने देखा कि तौल में सेठ ने डंडी मार दी। उसने सेठ से कहा - ‘कल तो आप साधु महाराज की बातें सुनकर बड़ा भक्ति-भाव जता रहे थे और आज उन्हें भूल गए?’ सेठ त्यौरी चढ़ाकर बोला - ‘तुम सामान खरीदने आए हो या उपदेश देने।’ तब चोर ने कहा - ‘जो दुनिया को धोखा देता है, वह स्वयं को धोखा देता है। अच्छी बातें सुनो ही नहीं, गुनो भी।’ अब सेठ निरुत्तर था। सार यह है कि सद्गुणों को आचरण में उतारने वाला ही श्रेष्ठ मानव होता है।
 

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