घोटालों के भयावह होते आंकड़े
प्रीतीश नंदी | Aug 31, 2012, 01:56AM IST

कॉलेज में जहां मेरे संगी-साथी लैम्ब्डा कैलकुलस या औसत मूल्य प्रमेयों समेत विभिन्न तरह के गणितीय सवालों के साथ जूझते रहते, वहीं मैं जेम्स जॉयस की रचनाओं में डूबा रहता। ऐसा करना मेरे लिए कहीं ज्यादा आनंददायक था। इसके अलावा उस दौर में हेनरी मिलर द्वारा रचित ‘द ट्रॉपिक ऑफ कैंसर’ जैसे उपन्यास भी मौजूद थे। उन दिनों हेनरी मिलर की रचनाएं भारत में प्रतिबंधित थीं। इस वजह से उनकी अंतरंग संबंधों पर केंद्रित रचनाओं को चोरी-छिपे पढ़ने में और भी ज्यादा मजा आता था।
बहरहाल, गणित के प्रति मेरे दुराव की मूल वजह यह थी कि मैं उंगलियों पर गिनने लायक छोटे-मोटे आंकड़ों के साथ तो सहज रहता, लेकिन बड़ी-बड़ी या लंबी गणनाएं करना मुझे काफी उबाऊ लगता था। उस समय कंप्यूटर तो क्या कैलकुलेटर भी चलन में नहीं आए थे। इस वजह से जो कुछ भी गणना के लिहाज से मेरी उंगलियों से परे होता, वह मुझसे भी परे होता। वैसे आगे चलकर मैंने आंकड़ों के साथ सुलह करने की भी कोशिश की। मैंने मार्टिन गार्डनर को अपना गुरु माना और उनकी आकर्षक गणितीय पहेलियों के माध्यम से इसे साधना चाहा, लेकिन आज भी जब बड़े आंकड़ों की बात आती है तो मैं चक्कर में पड़ जाता हूं।
दो हफ्ते पहले जब नियंत्रक व महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट से यह खुलासा हुआ कि सरकार ने पावर, कोयला और उड्डयन सेक्टर में देश के 38,00,00,00,00,000 रुपए डुबो दिए हैं, तो इस आंकड़े को देखकर मेरा सिर चकराने लगा। इसमें २जी स्पेक्ट्रम घोटाले की रकम को भी जोड़ लें, जहां पर एक बार फिर सीएजी के आकलन के मुताबिक हमें 17,66,45,00,00,000 रुपए का नुकसान बताया गया। इससे शायद आपको समझ में आ जाएगा कि क्यों मुझे इस तरह के बड़े-बड़े आंकड़े डराते हैं। इसमें यदि राष्ट्रमंडल खेल घोटाले (तकरीबन 7,00,00,00,00,000 रुपए) से लेकर आदर्श सोसायटी व महाराष्ट्र सिंचाई घोटाले (जहां पर सैकड़ों करोड़ रुपए किसी सिंचाई परियोजना को अंजाम दिए बगैर ही डकार लिए गए) इत्यादि की रकम भी जोड़ लें तो हमारे समक्ष ऐसे हैरतअंगेज आंकड़े होंगे, जिनकी गणना करना कम से कम मेरे बूते की बात तो नहीं है।
हां, मैं जानता हूं कि सीबीआई २जी स्पेक्ट्रम घोटाले के आंकड़े को चुनौती देते हुए इसे घटाकर 3,09,84,55,00,000 रुपए तक ले आई जबकि कपिल सिब्बल तो इससे कहीं आगे निकल गए और अपनी असाधारण गणितीय जादूगरी (जिसकी तुलना सिर्फ महान गोगिया पाशा से ही हो सकती है) का इस्तेमाल करते हुए इसे ‘जीरो लॉस’ तक पहुंचा दिया वहीं भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने इसमें ३क्,क्क्,क्क्,क्क्,क्क्क् रुपए का लाभ बताया।
इस तरह के हैरतअंगेज बाजीगरी करतबों ने उन तमाम मूढ़मतियों को शर्मिदा कर दिया, जो कहते हैं कि आंकड़े कभी झूठ नहीं बोलते। आंकड़े न सिर्फ झूठ बोलते हैं, बल्कि पब्लिक फंड्स के गबन से जुड़े होने पर पूरी बेशर्मी से झूठ बोलते हैं। पब्लिक फंड्स यानी वह धन जो आप और हम अपनी खून-पसीने की कमाई से कर के रूप में चुकाते हैं और जिसका सरकार अपने हिसाब से इस्तेमाल करती है। वास्तव में करदाताओं के पैसे की संस्थागत ढंग से चोरी का चलन मौजूदा दौर की सबसे बड़ी विशेषता है।
अपने पत्रकारिता कॅरियर के दौरान मेरा जिस सबसे बड़े आंकड़े से वास्ता पड़ा, वह था 64 करोड़ रुपए। हां, आपने ठीक पढ़ा। यह बोफोर्स घोटाले का आंकड़ा था। इससे पहले एचडीडब्ल्यू घोटाला हुआ था। मैं खुद को खुशनसीब समझता हूं कि मेरा इस तरह के आंकड़ों से वास्ता पड़ा। आज के दौर में घोटालों के जो आंकड़े आते हैं, वे तो मेरी समझ से भी परे हैं। मेरे लिहाज से तो गणना में लाख करोड़ से पहले आता है, जिस तरह हजार लाख से पहले आता है। लेकिन आज के घोटालों में तो करोड़ के बाद लाख गिना जाता है। आज ऐसे किसी घोटाले को गौर करने लायक नहीं समझा जाता, जिसका आंकड़ा कुछ लाख करोड़ से ऊपर न जाता हो।
चूंकि मैं इस तरह के आंकड़ों को नहीं गिन सकता, लिहाजा इन्हें किसी रट्टू तोते की तरह रट लेता हूं। फिलहाल मैं यही कर रहा हूं। वास्तव में पहली बार मुझे अब जाकर महसूस हो रहा है कि मैंने गणित सीखने पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। जो कुछ हो रहा है, उसे देखते हुए तो लगता है कि भविष्य के घोटालों के आंकड़ों में और भी शून्य जुड़ेंगे। मेरे ख्याल से घोटालेबाजों का इरादा इन आंकड़ों को आपकी व मेरी (और जनता की) सोच के दायरे से परे ले जाने का है।
वास्तव में यूपीए-२ के कार्यकाल में ऐसा होने भी लगा है।
मेरे छोटे-से नोकिया को तो छोड़िए, यहां तक कि मेरे ऑफिस में मौजूद डेस्कटॉप कैलकुलेटर्स में भी ये आंकड़े नहीं समा सकते। मौजूदा दौर में होने वाले घोटाले आंकड़ों के लिहाज से न सिर्फ हमारी सोच से आगे निकल गए हैं, बल्कि उन्होंने हमारी रोजमर्रा की तकनीक से भी पार पा लिया है। संभवत: इसी वजह से सरकार इनसे बच निकलती है, क्योंकि मेरी तरह 99.99 फीसदी भारतीय तो इस तरह के बड़े-बड़े आंकड़ों को पढ़ ही नहीं सकते, उनकी असल भयावहता को समझने की बात तो छोड़ ही दीजिए।






