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बचपन का नादान दुस्साहस

रस्किन बॉन्ड | Sep 08, 2012, 00:30AM IST
 
 

बचपन में नादानीवश कई बार हम ऐसा दुस्साहस कर जाते हैं, जिसकी यादें ताउम्र हमारे साथ रहती हैं। मैंने भी एक बार अपने बोर्डिग स्कूल की सख्तियों से तंग आकर अपने दोस्त दलजीत के साथ भागने का दुस्साहस किया था। हमारा लक्ष्य जामनगर बंदरगाह था, जहां से हम अफ्रीका जाने वाले थे। लेकिन दिल्ली पहुंचने के बाद जो हुआ, उसने हमारी जिंदगी मे बड़ा फर्फ लाया।

दिल्ली स्टेशन पर उतरने के बाद हम पूरे आत्मविश्वास के साथ निकास द्वार की तरफ बढ़ चले। हम जल्द ही टिकट कलेक्टर को अपने टिकट सौंपकर बाहर निकल जाने वाले थे। भीड़ घनी थी और लोग धीरे-धीरे ही चल-फिर पा रहे थे। यह अच्छी बात थी, क्योंकि जब हम बाहर जाने के दरवाजे से बस 30 फुट ही दूर थे, मैंने अपने गणित के शिक्षक मिस्टर जैन को टिकट कलेक्टर से बातें करते देखा।


हमारे स्कूल में मिस्टर जैन सबसे माहिर शिक्षक थे और साफ था कि उन्हें हमारे ही पीछे भेजा गया था। थुलथुल शरीर वाले मि. जैन चश्मा पहनते थे। ऐसी स्थिति में अब हमें निकास द्वार से दूर खिसकना था। अपने दोस्त दलजीत को अपनी तरफ खींचते हुए मैं फुसफुसाया, ‘चलो, यहां से चलें।’ दलजीत ने पूछा, ‘आखिर हुआ क्या?’ उसने मिस्टर जैन को नहीं देखा था। मैंने कहा, ‘क्या तुम्हें दिखाई नहीं दे रहा? टिकट कलेक्टर के पास देखो।’ तब वहां चंपत हो जाने की हड़बड़ी में दलजीत करीब-करीब उलझ ही गया था। भीड़ निकास द्वार की तरफ ठेले जा रही थी और हम एक मानव दीवार के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे, जो हमें निकलने के लिए कोई सुराख तक नहीं दे रही थी। ठीक इसी समय मिस्टर जैन ने हमें देख लिया। हमने उनका चिल्लाना सुना। ‘लड़को, इधर आओ! रस्टी! दलजीत!’


एकबारगी तो मैं अपने शिक्षक की जानी-पहचानी आवाज में मिले आदेश का पालन करने ही वाला था कि तभी मेरी आंखों के सामने क्लासरूम, छात्रावास, प्रिंसिपल का रौबीला चेहरा घूम गया। यह सब याद आते ही मुझे लगा कि मैं जितना तेज दौड़ सकता हूं, दौड़कर वहां से निकल जाऊं। मैं तब तक दौड़ता रहना चाहता था, जब तक कि जामनगर के बंदरगाह पर अपने अंकल के जहाज पर न पहुंच जाऊं। हम एक चाकू, दो पैकेट बिस्कुट, कुछ बासी ब्रेड, थोड़ी मिठाई और जेब में कुल जमा 36 रुपए लेकर स्कूल से भागे थे। हम दोनों ही बोर्डिग स्कूल के जीवन से ऊब चुके थे और हमें उम्मीद थी कि मेरे अंकल हमें अपने जहाज पर जगह देकर अफ्रीका पहुंचा देंगे। दलजीत के पिता पूर्वी अफ्रीका में कारोबार करते थे।


बहरहाल, स्टेशन पर मि. जैन को देखकर दलजीत पल भर के लिए भी नहीं ठिठका। वह एक ऊंचे कद के जाट किसान के पैरों के बीच से निकला और इस चक्कर में उसकी पगड़ी लगभग खिंच ही गई थी। दूसरी तरफ मैं दो हट्टी-कट्टी पंजाबी महिलाओं के बीच की खाली जगह की ओर भागा, लेकिन मेरे पूरी तरह निकल पाने के पहले ही वे करीब आ गईं और नतीजतन सारे पैर-हाथ गड्ड-मड्ड हो गए। मि.जैन मेरे पीछे काफी करीब पहुंच चुके थे। और तभी एक कुली कंपार्टमेंट में घुसने के लिए प्लेटफॉर्म पर कूदा और मि. जैन के साथ उसकी टक्कर हो गई।


मि. जैन गिर पड़े और उनका चश्मा भी कहीं गिर गया। मैंने किसी तरह महिलाओं के बीच से अपने को बाहर निकाला और दलजीत के पीछे हो लिया, जो राह बनाने के लिए मुट्ठी और कोहनियों का इस्तेमाल करके भीड़ को चीरते हुए मुझसे काफी आगे निकल चुका था। इस बीच वह एक बार रुका और उसने मुड़कर देखा कि कहीं मैं पकड़ तो नहीं लिया गया हूं। मुझे आजाद पाकर वह चिल्लाया, ‘आ जाओ, रस्टी! रेलवे ट्रैक से होते हुए आ जाओ!’
उसने प्लेटफॉर्म से छलांग लगाई और वहां इंतजार में थमी ट्रेन के दो डिब्बों के बीच से फिसलकर निकल गया। मैं बड़ी अनिच्छा से उसके पीछे गया। मुझमें हमेशा रेलवे लाइन पार करने को लेकर एक अनजाना भय रहा था और मुझे डरावने सपने आते थे, जिनमें मैं खुद को रेलवे पटरियों पर असहाय पड़ा पाता, हालांकि मेरे हाथ-पैर बंधे नहीं होते थे। और इस बीच एक रेल इंजन अपनी ओर बढ़ता नजर आता। जब इंजन तीन फुट दूर होता, हमेशा तभी मेरी नींद खुल जाती। कई बार मैं सोचता हूं कि अगर आखिरी क्षणों में मेरी नींद न खुल पाती तो क्या होता!


इस बीच दलजीत दो-दो पटरियां पार कर चुका था और दूसरी तरफ की रेलिंग पर चढ़ रहा था। मैंने बाएं देखा, दाएं देखा और फिर बाएं देखा तो पाया कि दूर से एक ट्रेन धड़धड़ाते हुए बढ़ी आ रही थी। वह काफी दूर थी और मेरे पास पटरियां पार करके दलजीत तक पहुंच जाने का बहुत समय था। पर मैं एक बेतुके डर से भरा हुआ था और मेरे माथे, बांह और हथेलियों पर पसीने की बूंदें छलछला आई थीं। दलजीत ने जल्दी-जल्दी में पुकारा, ‘आ जाओ!’ मैंने एक गहरी सांस खींची और दौड़ पड़ा। मैं इतना डरा हुआ था कि लड़खड़ाकर रेल की पटरियों पर गिर पड़ा। मुझे लगा कि जमीन थरथरा रही है, जैसे भूकंप में कांपती है। क्या आखिरकार मेरा दु:स्वप्न हकीकत में बदलने जा रहा था? मैं अब भी दलजीत का चिल्लाना सुन सकता था। इंजन छुक-छुक करता हुआ लगातार करीब आ रहा था।


‘आओ, रस्टी, जल्दी उठो!’ दलजीत की आवाज अब मेरे कान के एकदम पास थी और उसे ठीक अपनी बगल में पाकर मैं हैरान था। वह मेरी बांह को जकड़े हुए था। उसकी मौजूदगी से मुझे बल मिला। मैं अपने पैरों पर खड़ा हुआ, मैंने बैग पर झपट्टा मारा और उसके साथ दूसरी ओर दौड़ पड़ा। उस तरफ जालीदार लोहे की बाड़ हमारा रास्ता रोके खड़ी थी। वह करीब दस फुट ऊंची थी और उस पर पैर टिकाने की कोई जगह भी नहीं थी, जिस पर हम चढ़ सकें। इसलिए हम बाड़ के साथ-साथ ही दौड़ते रहे, जब तक कि हमें एक खुली जगह नहीं मिल गई। यहां से घुसकर हम माल इकट्ठा होने वाले अहाते में पहुंच गए थे।


हम एक घूमने वाले दरवाजे से होकर निकले और बगल की एक छोटी-सी गली में आ गए। हम संकरी गलियों और पतले रास्तों पर लगातार दौड़ रहे थे.. छोटी-छोटी मस्जिदें, मंदिर, स्कूल, दुकानें एकदम गुंथी हुई थीं..तभी हमने खुद को एक चौड़ी सड़क पर पाया। वहां काफी चहल-पहल और शोर-शराबा था। हम चांदनी चौक में थे- दिल्ली की मशहूर, जौहरियों वाली ऐतिहासिक जगह। खैर, बाद में हम धर लिए गए और हमें वापस अपने स्कूल पहुंचना पड़ा। यह हमारे बचपन का एक दुस्साहसी अभियान था, जिसमें हम कहीं और जाना चाहते थे, लेकिन कहीं और पहुंच गए।

लेखक पद्मश्री से सम्मानित ब्रिटिश मूल के साहित्यकार हैं।
 
 
 

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