वैज्ञानिकों को न्याय मिले
Source: भास्कर न्यूज | Last Updated 00:30(07/02/12)
एंट्रिक्स-देवास सौदे में घपला हुआ या यह सिर्फ नियमों के उल्लंघन का मामला है? बीके चतुर्वेदी और प्रत्युष सिन्हा जांच समितियों की रिपोर्टो के जारी हुए हिस्सों से यह साफ नहीं होता। दोनों समितियां इस नतीजे पर तो हैं कि 2005 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की मार्केटिंग शाखा एंट्रिक्स कॉपरेरेशन और बेंगलुरू की प्राइवेट कंपनी देवास मल्टीमीडिया के बीच अंतरिक्ष स्पेक्ट्रम के उपयोग के हुए करार में प्रक्रियाओं का उल्लंघन हुआ और सरकार को उस बारे में पूरी सूचना देने जैसी प्रशासनिक जिम्मेदारियां सही ढंग से नहीं निभाई गईं, लेकिन देवास कंपनी से संबंधित वैज्ञानिकों को कोई लाभ मिला, इसके कोई सबूत सामने नहीं आए हैं।
केंद्र सरकार ने इन्हीं समितियों की रिपोर्ट के आधार पर इसरो के पूर्व प्रमुख जी माधवन नायर और तीन अन्य वैज्ञानिकों की भविष्य में किसी सरकारी पद पर नियुक्ति पर रोक लगा दी है। यह कदम सही है, इसे अब सरकार को साबित करना है। अगर इसी कोशिश में दोनों रिपोर्टो के कुछ हिस्से जारी किए गए, तो कहा जा सकता है कि उससे तस्वीर साफ नहीं हुई है, बल्कि माधवन नायर का आरोप है कि अंतरिक्ष विभाग ने जान-बूझकर रिपोर्ट के उन हिस्सों को जारी किया, जो उसके लिए सुविधाजनक है। यह सचमुच हैरतअंगेज है कि अगर जांच रिपोर्टो को सार्वजनिक करने का फैसला किया गया, तो फिर उन्हें पूरा क्यों नहीं जारी किया गया? ऐसे संवेदनशील मामलों से निपटने का केंद्र का तरीका पहले से विवादित है।
सेनाध्यक्ष की उम्र के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उस पर कड़े सवाल उठाए हैं। अगर इसरो के पूर्व वैज्ञानिक भी इस मामले में कोर्ट चले गए और केंद्र अपने निर्णय को ठोस साक्ष्यों पर आधारित साबित नहीं कर पाया, तो सरकार के लिए नई मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। इसलिए जरूरत संभलकर चलने की है। वैज्ञानिक अगर मानते हैं कि उनके खिलाफ कार्रवाई ‘विसंगतियों एवं गलत तथ्यों से भरी’ एक रिपोर्ट के आधार पर की गई, तो उनका पक्ष सुना जाना चाहिए। इस मामले में वैज्ञानिकों से पूरा न्याय हो, यह सुनिश्चित करना केंद्र की जिम्मेदारी है।