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समाज में पैठी पुरुषवादी वर्चस्व की भावना

पूजा सिंह | Jul 14, 2012, 00:46AM IST
 
 

बीते दिनों असम के गोवाहाटी में जो कुछ घटा, वह किसी भी सभ्य समाज और संवेदनशील मनुष्य को विचलित कर देने वाला है। बर्बर लोगों के एक समूह ने जन्मदिन की पार्टी से लौट रही 11वीं कक्षा की एक छात्रा को जिस तरह से नोचने-खसोटने की कोशिश की, वह दिल को दहला देने वाला मंजर था। भला हो पत्रकार दिव्या बोडरेलोइ का जिनकी बदौलत इस घृणित घटना की तस्वीरें दुनिया के सामने आ सकीं। मैं सोचती हूं कि क्या घटना में शामिल लोगों के कृत्य को मौन होकर देखने वाले वहां मौजूद प्रत्यक्षदर्शियों का अपराध क्या उनसे कम था?

मुझे पता है कि बहुत जल्द इस घटना के बारे में ऐसे तर्क सामने आने लगेंगे कि उस लड़की ने कम कपड़े पहन रखे थे, वह देर रात पार्टी करके अकेली लौट रही थी या फिर उन लड़कों ने शराब पी रखी थी। कुछ लोग इसे कानून-व्यवस्था की समस्या करार देकर इसका सरलीकरण करने की कोशिश करेंगे। लेकिन मैं इस घटना को मनोवैज्ञानिक और आर्थिक-सामाजिक समस्या के रूप में देखने की कोशिश कर रही हूं।

रात को लड़की का अकेले निकलना जाहिर करता है कि यह उसका खुद का निर्णय है, फिर चाहे वह पार्टी में जा रही हो या कहीं और। लेकिन जब-जब कोई लड़की ऐसा करती है तो वह हमारे समाज में बहुत गहरे तक धंसी पुरुषवादी सोच को अपने अनुरूप नहीं लगती है। ताउम्र महिलाओं को एक वस्तु समझते आए लोगों के लिए यह बर्दाश्त के बाहर है कि कोई लड़की अपनी जिंदगी से जुड़ा कोई भी छोटा या बड़ा फैसला खुद लेगी (उनके इस विचार निर्माण में बहुत बड़ा हिस्सा मौजूदा दौर के टेलीविजन विज्ञापनों का भी है, जहां डियो से लेकर 3जी तक हर किस्म के विज्ञापन स्त्री यौनिकता के सहारे बेचे जा रहे हैं)। नतीजतन वे उसे सबक सिखाने पर उतारू हो जाते हैं।

इस घटना से जुड़ा सामाजिक-आर्थिक पहलू भी है। रोजी-रोटी के संकट ने एकल परिवारों को जन्म दिया है, जहां पलने वाले बच्चे मां और कभी-कभी बहन के अलावा बाकी रिश्तों से पूरी तरह अनजान होते हैं। उनके लिए चाची, मामी,
मौसी, दादी, भाभी आदि रिश्ते मानो किसी दूसरे ग्रह की बातें हैं। जाहिर है जब वे स्त्रियों के संपर्क में रहेंगे नहीं तो उनके भीतर उनके लिए सम्मान की भावना आखिर कहां से आएगी। रही-सही कसर इंटरनेट, मोबाइल आदि पर पोर्न सामग्री की सहज उपलब्धता ने पूरी कर दी है। धीरे-धीरे यह सब उनके अवचेतन का हिस्सा बन जाता है।

बात का दायरा थोड़ा-सा बढ़ाएं तो इस घटना को असम की महिला विधायक रूमीनाथ के साथ हुई बर्बरता से जोड़कर भी देखा जा सकता है। नैतिकता के पचड़े में न पड़ें तो एक मासूम-सा सवाल यह उठता है कि क्या देश की जनता दूसरी शादी करने वाले पुरुष नेताओं के साथ भी वैसा ही पाशविक व्यवहार कर सकती है? शायद नहीं। वजह एकदम स्पष्ट है- रूमीनाथ एक स्त्री है। ऐसी तमाम समस्याओं का एक ही हल है पुरुषवादी वर्चस्व की सोच को जड़ से मिटाना।

हालांकि यह कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है, लेकिन यकीनन वह इसके उपचार का एक माध्यम तो है। पता नहीं वह दिन कब आएगा, जब हमारे समाज में महिलाओं के लिए अपनी मर्जी से जीना संभव हो सकेगा, लेकिन तब तक ऐसी किसी भी घटना में शामिल लोगों को इतना कठोर दंड तो मिलना ही चाहिए ताकि न केवल वे बल्कि उनके अंजाम से परिचित हर शख्स ऐसा कुकृत्य करने से पहले कम से कम हजार दफा सोचे।
 
 
 

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