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काम व जवाबदेही के बीच संतुलन की तलाश

गुरचरन दास | Dec 29, 2012, 07:50AM IST
काम व जवाबदेही के बीच संतुलन की तलाश
हाल  ही में टाटा ग्रुप के चेयरमैन पद से रिटायर हुए रतन टाटा विनम्र-मितभाषी हैं और शायद ही कभी शिकायत करते हैं। लेकिन इस महीने की शुरुआत में उन्होंने अपनी वेदना शब्दों में व्यक्त की। उनका कहना था कि सरकार की निष्क्रियता के चलते पूंजी निवेश देश से दूर जा रहा है और ऐसी सूरत में उनके जैसे कारोबारी समूह विदेश में जाकर संभावनाएं तलाशने के लिए मजबूर हो जाते हैं, जहां आपको किसी स्टील प्लांट के क्लियरेंस के लिए सात-आठ साल इंतजार नहीं करना पड़ता। वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने भी उनसे सहमति जताते हुए याद दिलाया किमंजूरी न मिलने की वजह से 100 से अधिक मेगा परियोजनाएं वर्षो से अटकी पड़ी हैं। जाहिर है, सरकार की यह नाकामी देश की अर्थव्यवस्था को घुटनों पर लाने के लिए काफी हद तक जिम्मेदार है।
 
न केवल कंपनियों के सीईओ बल्कि आम भारतीय भी वर्षो से यही शिकायत कर रहे हैं। आखिर न्याय मिलने या किसी सड़क के निर्माण में सालों का वक्त क्यों लगता है? हमारे यहां भ्रष्टाचार, सूचना के अधिकार, लोकतांत्रिक जवाबदेही के बारे में खूब सार्वजनिक बहसें होती हैं, लेकिन कोई भी त्वरित निर्णय लेने या हमारी कमजोर, नरम और ‘घिसटती’ व्यवस्था की क्षमता बढ़ाने की जरूरत के बारे में नहीं बोलता। ‘कैग’ द्वारा किए गए बड़े-बड़े खुलासों या लोकपाल के बारे में हायतौबा मचाने से हमारी व्यवस्था की कार्रवाई करने की क्षमता नहीं सुधरेगी। क्या जवाबदेही और पारदर्शिता के प्रति अपने अत्यधिक लगाव में हम भूल गए कि राज्य-व्यवस्था को वास्तव में सामूहिक कार्रवाई के लिए बनाया गया है?
बेशक जवाबदेही अहम है। पिछले एक दशक में बुद्धिजीवियों द्वारा समर्थित सामाजिक कार्यकर्ताओं के अभियानों से सूचना का अधिकार कानून जैसे कई अहम फायदे मिले हैं। अन्ना हजारे के आंदोलन के चलते लोगों में शीर्ष पर पसरे भ्रष्टाचार के बारे में जागरूकता आई और इससे ताकतवर-रसूखदार लोगों की गिरफ्तारी में भी मदद मिली। हमारा इन उपलब्धियों पर गर्व करना उचित है, जिन्होंने हमारे लोकतंत्र को मजबूत किया। लेकिन इन कदमों से नागरिकों के प्रति राज्य-व्यवस्था की सेवाओं में ज्यादा सुधार नहीं आया है। मुकदमे अभी भी अदालतों में अटके पड़े हैं, सड़कों के निर्माण की कछुआचाल है, रसूख या पैसे के इस्तेमाल के बगैर पुलिसवाले प्राथमिकी दर्ज करने में हीलाहवाली करती है, एक बिजली संयंत्र खड़ा करने के लिए 117 अनुमोदन और 7 से10 साल का वक्त चाहिए।
 
अजीब बात यह है कि लोकतांत्रिक जवाबदेही पर बल देने से हमारी कमजोर व्यवस्था और भी कमजोर हो सकती है। एक औसत सरकारी अधिकारी (जो पहले ही कमजोर दिल व भीरु है)अब अपनी कलम फंसाने में और भी डरता है। यह भ्रष्टाचार के खिलाफ हमारी लड़ाई का दूसरा पहलू है। जवाबदेही की चाह ने व्यवस्था को पंगु बना दिया है। आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था को लोगों के प्रति जवाबदेह होने के साथ समय पर सेवाएं देने की क्षमता में संतुलन बनाना सीखना होगा।
 
अन्य लोकतंत्रों को भी संतुलन की इस समस्या का सामना करना पड़ा है, लेकिन उन्होंने अपनी संस्थाओं में सुधार करते हुए इनसे निपटने का रास्ता खोज लिया। वास्तव में, सभी संस्थाएं जवाबदेही और कार्रवाई के बीच संतुलन का लक्ष्य लेकर चलें। अगर किसी पब्लिक लिमिटेड कंपनी का सीईओ या एमडी पूरे दिन शेयरधारकों की शिकायतें सुनता रहे, तो कंपनी चल नहीं पाएगी। हम पर पहले ही ‘करने वालों का नहीं, बोलने वालों का राष्ट्र’ होने का ठप्पा लगा है। लिहाजा हमारे देश को अब कार्रवाई पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।
 
पिछले कुछ दिनों से दिल्ली गैंगरेप के खिलाफ देशभर में अभूतपूर्व विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। कई लोगों ने दुष्कर्मियों को मृत्युदंड जैसी कठोरतम सजा देने की मांग की है। हालांकि लोग यह नहीं समझ रहे हैं कि सजा की मात्रा नहीं वरन इसे जल्द से जल्द दिए जाने की निश्चितता ही दुष्कर्मियों या बाकी अपराधियों में भय पैदा कर सकती है। दुष्कर्मी को लगता है कि वह ऐसा बर्बर कृत्य करके भी बच जाएगा, क्योंकि यहां न्याय मिलने में सालों लग जाते हैं। देश को न सिर्फ दुष्कर्म, बल्कि तमाम तरह के अपराधों के लिए ‘फास्ट ट्रैक न्याय’ की जरूरत है। अनेक आयोगों ने न्याय प्रणाली में तेजी लाने के लिए कई सुझाव दिए, लेकिन किसी भी सरकार ने इस दिशा में कार्य करने की मंशा नहीं दिखाई। विचार और कार्रवाई के बीच लगातार बढ़ती खाई एक विशिष्ट भारतीय रोग है- हम बोलने वालों का राष्ट्र हैं, करने वालों का नहीं।
 
हालांकि कई ऐसी बातें भी हैं जो भारत के भविष्य के प्रति आशान्वित करती हैं। यह एक स्थिर, खुला और आश्चर्यजनक ढंग से सहिष्णु राष्ट्र है। आर्थिक सुधारों ने इसे तीव्र विकास के संभावनाशील रास्ते पर ला दिया है। इसका मध्यम वर्ग तेजी से बढ़ रहा है और इसके गरीब कैश ट्रांसफर जैसी बेहद प्रभावी कल्याणकारी योजना से लाभान्वित होंगे। लेकिन इसकी कमजोर कड़ी एक नरम, कमजोर व्यवस्था है, जिसकी शासन संबंधी संस्थाओं- नौकरशाही, न्यायपालिका और पुलिस में सुधारों की बेहद दरकार है। 
 
हमें नहीं भूलना चाहिए कि हमारे संविधान निर्माताओं ने राष्ट्र को तीन स्तंभों पर स्थापित किया।  पहला स्तंभ, अटल इरादों के साथ स्वतंत्र रूप से कार्य करने की शक्ति। दूसरा है, कानून का राज जो राजनीतिक शक्ति को सीमित करता है और भ्रष्टाचार रोकता है। तीसरा स्तंभ है, लोकतंत्र व जवाबदेही, लोगों को यह छूट देना कि जब शासक बुरा बर्ताव करने लगें, तो वे उन्हें बदल दें। एक सफल राष्ट्र में ये तीनों तत्व संतुलित मात्रा में होते हैं और यही आधुनिक राजनीति का चमत्कार है। हमें इस वक्त ऐसी सरकार की दरकार है, जिसकी लोगों के प्रति जवाबदेही और कार्य करने की क्षमता के बीच प्रभावी संतुलन हो। 
 
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