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जब सिकंदर को हुआ शक्तिहीनता का बोध

Bhaskar News | Dec 07, 2012, 23:07PM IST
सिकंदर  की विश्व विजय से सभी परिचित हैं। उसने अपने इस विजय-अभियान से अपार धन-दौलत कमाई। तत्कालीन समय में वह सर्वाधिक अमीर बादशाह था। इस अपार धन-संग्रह से उपजी ताकत ने उसे अहंकारी बना दिया था। उसे लगता था कि उसका मुकाबला कोई नहीं कर सकता और वह सर्वशक्तिमान है। 
 
उम्र की सांध्य-बेला में सिकंदर बीमार हुआ। उसकी चिकित्सा के लिए राज्य के बड़े से बड़े वैद्य-हकीम आए और उन्होंने अपना बेहतर से बेहतर उपचार सिकंदर को दिया, किंतु वह स्वस्थ नहीं हो पाया। उसके मंत्रियों ने दूर देशों के चिकित्सकों को भी बुलवाकर उसका इलाज करवाया, किंतु सिकंदर का मर्ज लाइलाज ही रहा। सभी चिकित्सकों ने कह दिया कि अब वह नहीं बचेगा, किंतु सिकंदर को बचने की आशा थी।
 
इसलिए उसने अपने सभी खास लोगों को बुलाकर कहा- ‘जैसे भी हो, मेरी जान बचाओ।’ उन लोगों ने बड़े दुख के साथ सिकंदर से निवेदन किया - ‘बादशाह सलामत! इलाज मर्ज का हो सकता है, मौत का नहीं।’ यह सुनकर सिकंदर का अहंकार चूर-चूर हो गया। उसने महसूस किया कि उसका यह मानना कि वह दुनिया में सबसे ताकतवर है, कितना मिथ्या था।
 
उसने अपने वजीर को बुलाकर कहा - ‘मेरा जनाजा निकालते वक्त मेरे दोनों हाथ बाहर कर देना।’ सिकंदर की मृत्यु के बाद उसकी इस अंतिम इच्छा को पूर्ण किया गया। सार यह है कि जन्म और मृत्यु खाली हाथों के साथ घटते हैं। इसलिए बीच की यात्रा अहंकार, लोभ और द्वेष से परे रहकर विनम्रता, संतोष व प्रेम के साथ पूर्ण करनी चाहिए।
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