जीवन दर्शन..
महात्मा गांधी के पास अनेक व्यक्ति अपनी विभिन्न प्रकार की समस्याएं लेकर पहुंचते थे। चूंकि गांधीजी का जनसंपर्क अत्यंत विशुद्ध था और उनका स्वभाव भी उदार व सहयोगी, इसलिए आम जनता से लेकर खास लोगों तक कोई भी उनके पास आने में संकोच नहीं करता था। गांधीजी जब पार्टी के कार्यो से निवृत्त हो अवकाश पर रहते तो लोगों से भेंट का उनका सिलसिला चल पड़ता। ऐसे ही एक बार गांधीजी के पास एक सेठजी आए। गांधीजी उनका चेहरा देखकर समझ गए कि वे काफी परेशानी में हैं। गांधीजी ने उनसे बड़े स्नेह से उनकी समस्या के विषय में पूछा तो वे शिकायती लहजे में बोले - देखिए न बापू दुनिया कितनी कपटी है। मैंने पचास हजार रुपए लगाकर एक धर्मशाला बनवाई। धर्मशाला बनने पर मुझे ही उसकी प्रबंध समिति से अलग कर दिया गया। जब तक वह नहीं बनी थी, तब तक वहां कोई नहीं आता था और अब बन जाने पर पचासों उस पर अधिकार जताने आ गए हैं।
गांधीजी ने मुस्कराकर समझाया - दान का सही अर्थ न समझ पाने के कारण आपको दुख हो रहा है। किसी चीज को देकर कुछ पाने की इच्छा दान नहीं, व्यापार है और जब आपने व्यापार किया है तो लाभ और हानि दोनों के लिए आपको तैयार रहना चाहिए। व्यापार में लाभ भी हो सकता है और हानि भी। गांधीजी की बात सुनकर सेठजी को अपनी गलती का अहसास हुआ। सार यह है कि दान तभी फलितार्थ होता है, जब वह प्रतिदान की इच्छा से रहित हो। नि:स्वार्थ और निरपेक्ष भाव से किया गया दान अपने सही आशय को पूर्ण करता है।