ममता नामक गुब्बारे से निकली हवा का शोर
Source: एम.जे. अकबर | Last Updated 01:49(13/11/11)
नीतिकथाएं लिखने वाले, जिनमें प्राचीन यूनानी ईसप सबसे बेहतर थे, जानते थे कि वे किस बारे में बात कर रहे हैं। सदियों पहले ईसप ने सुनने वालों को बताया कि अपने मुख्य हिस्से को संवाद के रूप में धमकी देना खतरनाक होता है।
जब आप डराएं-धमकाएं और घर को ढहा देने का इरादा जताएं, तो आपको एक साधारण-से सवाल पर विचार करना चाहिए : क्या यह आपका अपना घर है? यह किराए पर लिया गया अस्थायी आवास हो सकता है, लेकिन जब तक ब्रोकर्स को किराए का दूसरा मकान नहीं मिल जाता और नया मकान मालिक दस्तावेजों पर दस्तखत नहीं कर देता, आप किराया देना बंद नहीं करते।
ममता बनर्जी व्यग्र राजनेता हैं, जो कगार पर सबसे ज्यादा खुश रहती हैं। उनके मिजाज में कुछ ऐसा है, जो उन्हें सुरक्षित ठिकाने को लेकर घबरा देता है। वे राजनीतिक आवास से जुआघर की तरह बर्ताव करती हैं, हमेशा संभावनाओं पर दांव लगाती हैं।
संभवत: अनुभव उन्हें ऐसी प्रवृत्ति की ओर धकेलते हैं। अखिर, बंगाल में उन्होंने दशकों तक समान नंबर पर खेला है। जब भी उन्होंने खोया, दांव को ऊंचा कर दिया, जिसमें निश्चित था कि जब भी चक्के पर कांटा उनके नंबर पर रुकेगा, उन्हें अभूतपूर्व मिलेगा। ऐसा हुआ भी!
किसी भी प्रतिबद्ध जुआरी के सामने एक बड़ा बुनियादी प्रश्न होता है
जीती हुई राशि के साथ आप क्या करते हैं? लगातार खेलते रहते हैं या अपनी धन-संपत्ति को समेटकर किसी ऐसे खेल में चले जाते हैं, जहां निवेश और उस पर वापसी के बीच कम तूफानी संबंध है? ऐसा लगता है कि ममता बनर्जी मध्य के विरुद्ध दोनों तरफ से खेलना पसंद करती हैं, इस उम्मीद में कि जो भी उनकी शर्तो पर देने को राजी होगा, वे जितना निचोड़ सकती हैं, निचोड़ लेंगी।
जब तक अच्छा चल रहा होता है, यह बुद्धिमानी भरा होता है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में अच्छी खबर चलायमान होती है। बेशक, अपने अच्छे की खातिर बहुत चतुर बनने के लिए आपको चालाक बनना होता है। इस बात का खतरा है कि ममता बनर्जी जरूरत से ज्यादा खींचे गए फिसलनभरे क्षेत्र में कदम रख दें।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के चलते समर्थन वापस लेने की उनकी धमकी को एक मोटी सुई से फुस्स कर दिया। सिंह-मुखर्जी का संदेश एकदम साफ था : कांग्रेस के तमाम सहयोगी प्रधानमंत्री को चिट्ठी भेजना चाहें और तर्कसंगत प्रतिउत्तर की उम्मीद रखें, तो उनका स्वागत है, लेकिन प्रधानमंत्री ब्लैकमेलिंग पर वक्त बर्बाद नहीं करेंगे।
वे ममता की धमकी से उस अनुभवी खिलाड़ी की अभ्यासगत सहजता के साथ निबटे, जिसने अपने घर के आसपास दर्जनों नए बच्चों को उछल-कूद मचाते देख लिया है। ममता नामक गुब्बारे से निकली गैस की आवाज राइटर्स बिल्डिंग और लाल दुर्ग के बीच के तमाम इलाके में सुनी जा सकी और इन दोनों के बीच स्थित प्रेस क्लब में सबसे तेज रही।
पत्रकार ममता बनर्जी की विश्वसनीयता की गणना का अगला चरण शुरू कर चुके हैं।
शायद सबक, जिसे राजनीतिज्ञ अच्छी तरह नहीं समझते, यह है कि जरूरी नहीं, लोग आम जनता के अधिकारों के नाम पर विशेषाधिकार प्राप्त अभिजात वर्ग से संघर्ष के साथ ही हो लें, जो कि ठोस निर्णय क्षमता के बगैर, सिर्फ भाव-भंगिमाएं बनाने की कला है। ममता बनर्जी मानती हैं कि वे दिल्ली को हड़काकर हर बार स्थानीय सड़कों की भावुकता का दोहन कर सकती हैं।
उन्होंने पहले बांग्लादेश के साथ तीस्ता जल समझौते को लेकर ऐसा किया, जब उन्होंने आखिरी पलों में चिड़चिड़ापन दिखाकर क्षेत्रीय कूटनीति में प्रधानमंत्री के अहम पल को मटियामेट कर दिया। प्रधानमंत्री अपनी उलझन और थोड़ी शर्मिदगी को निगल गए, लेकिन साथ ही गए। अपमान के दूसरे घूंट का लम्हा उनके प्रभाव को खोखला कर चुका होता, जो किसी भी मामले में कौंधता रहा है।
अंतर बिल्कुल साफ था। ममता बनर्जी के सांसदों ने प्रधानमंत्री से मिलने के लिए कोलकाता से अपने सफर की शुरुआत बंगाल टाइगर की तरह की। वे उनके कमरे से भटके हुए मेमनों की तरह बाहर आए। उस बिंदु तक डॉ. सिंह पेट्रोल की बढ़ी कीमतों से आगे बढ़ चुके थे और सांसदों ने रिरियाकर अपनी सहमति दी। ये शब्द बाहर आ चुके हैं कि प्रमं तीस्ता समझौते पर आगे बढ़ रहे हैं और यदि ममता बनर्जी को यह पसंद नहीं, तो वे अपनी आपत्तियों को अपने पास रख सकती हैं।
ममता को अभी भी बंगाल में काफी समर्थन है। सद्भावनाओं और साख का यह सुरक्षित भंडार तुरत-फुरत खाली नहीं हो सकता। लेकिन कह डालने की उनकी योग्यता के बारे में संदेह चाय के अड्डों पर नजर आने शुरू हो चुके हैं।
बंगाली जन जानते हैं कि चुनाव अभियानों के दौरान किए गए वादों को तत्काल वास्तविकता में बदलने के लिए उनके पास कोई जादू की छड़ी नहीं है। लेकिन वे यह भी जानते हैं कि कोलकाता में बेतरतीब ट्रैफिक को सुधारने के लिए उन्हें दिल्ली की मदद की जरूरत नहीं है।
भ्रष्टाचार की कानाफूसियां उन लोगों के चारों ओर इकट्ठा होकर जोर मार रही हैं, जिन्हें उन्होंने शहर के कापरेरेशन के नेतृत्व के लिए चुना है। उनके मंत्री चाहे कोलकाता में हों या दिल्ली में, जरा भी निर्णय लेने की इजाजत नहीं है। हर निर्णय सिर्फ और सिर्फ वही लेती हैं। वे निरंतर उनकी सनक के आतंक में रहते हैं।
वास्तविक चुनौती है सालाना बजट। वादों और संसाधनों के बीच का गणित भरभरा चुका है। ममता के मंत्रियों ने यह साफ-साफ दर्शा दिया है कि वे जमीन उपलब्ध नहीं करा सकते। वाम मोर्चे द्वारा पास की गईं विद्युत परियोजनाएं रुक गई हैं, क्योंकि अब जमीन उपलब्ध नहीं है। आप हवा में फैक्टरियां नहीं लगा सकते, कम से कम अभी तो नहीं।
बीती गर्मियों में ममता बनर्जी को जबर्दस्त जीत मिली, क्योंकि वामपंथी भूल चुके थे कि शासन कैसे किया जाता है। यह बंगाल के लिए त्रासदी होगी, अगर पता चलता है कि ममता बनर्जी तो कभी सीख ही नहीं पाईं।